अनंग संग भंग है
आज रंग है।
राति नींद नहिं आइ गोरि
सपन साँवरे भर भर अँकवारि
आज रंग है।
चहका मन चमक चम
चौताल ताल नाचे तन
साजन बुढ़ाय पर
जवान जबर देवर देख
धधका बदन मदन संग
मचा जोबन सरर जंग
हुइ चोली जो तंग है
आज रंग है।
बौराया आम ढींठ हुआ
बयार के झँकोर बहाने
घेर गया नेह गन्ध ।
पड़ोसी की साँस सूँघ
तीत नीम मीठ हुई
फगुआ का संग है!
आज रंग है।
जाने कितने बरस बीते
मितऊ से बात किए ।
चढ़ाय लियो भाँग आज
कह देंगे दिल के राज
खींच लाएँगे आँगन बार
मिट जाँयगे बिघन खार-
लगाना तंगी को तंग है
आज रंग है।
होली मानाने का गजबै ई ढंग है
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज रंग है.
रंग है त खेलें का भिनसहरे
के आई के जागी
ब्लागन के छोड़ के!
कविता ही रंग और कविता ही भंग है
आज रंग है.
चहका मन चमक चम
चौताल ताल नाचे तन
ई पढ़ा है जब से
मनवां बेताल हुआ
खोपड़ी में चल रहा अलगे से जंग है
आज रंग है.
....शुभ होली.
बहुत बेहतरीन!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.
आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.
-समीर लाल ’समीर’
आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.nice
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर रंग हैं होली के। आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढ़िया प्रस्तुति ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंहोली पर्व पर शुभकामनाये और बधाई .
"पड़ोसी की साँस सूँघ
प्रत्युत्तर देंहटाएंतीत नीम मीठ हुई"
क्या बात है !!!!!!!!
वाह, मेरे आगे तो गाँव का यह दृश्य नाच रहा है:
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहका मन तिनक तिन
ढोलक की धिनक धिन
बाजे पखावज तड़बक-तड़बक ताता धिन
घुंघरू पग बाँध लिया कलुआ लवण्डा
उछल-उछल गाता जोगीरा हुड़दंग है
पटपटात बाज रही चमड़े की चंग है
ढीली ढाली चोली खोल रही अंग है
आज रंग है।
लगाना तंगी को तंग है
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज रंग है।
शुभकामनाएं...
होली की शुभकामनाएँ ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी ऊर्जा को आपकी जिवटता को सलाम!!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंहोली ..की आत्मीय मुबारकबाद!!
होली की शुभकामनाएँ...!
प्रत्युत्तर देंहटाएंओहो ! इसीलिए तो नींद नहीं आ रही थी :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह गिरिजेश जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंसमाँ बाँध दिया आपने होली का।
चढ़ाय लियो भाँग आज
कह देंगे दिल के राज
खींच लाएँगे आँगन बार
मिट जाँयगे बिघन खार-
लगाना तंगी को तंग है
आज रंग है।
मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आ गया
हमसे खुल जाओ बवक़्ते मयपरस्ती एक दिन
वरना हम छेड़ेगें रख कर उज़्रे-मस्ती एक दिन
सादर
राति नींद नहिं आइ गोरि
प्रत्युत्तर देंहटाएंसपन साँवरे भर भर अँकवारि
नशाय दियो उमंग है
आज रंग है।
----------- यहाँ नशाय पर 'नसाय' ज्यादा सुन्दर
बैठता क्योंकि देशज की भंगिमा तद्भव की मांग करती है यहाँ !
संभव हो मैं ही गलत होऊं ! :)