सोमवार, 1 मार्च 2010

आज रंग है !

रंग हुड़दंग
अनंग संग भंग है
आज रंग है।

राति नींद नहिं आइ गोरि
सपन साँवरे भर भर अँकवारि
नशाय नसाय दियो उमंग है
आज रंग है।

चहका मन चमक चम
चौताल ताल नाचे तन
साजन बुढ़ाय पर
जवान जबर देवर देख
धधका बदन मदन संग
मचा जोबन सरर जंग
हुइ चोली जो तंग है
आज रंग है।

बौराया आम ढींठ हुआ
बयार के झँकोर बहाने
घेर गया नेह गन्ध ।
पड़ोसी की साँस सूँघ
तीत नीम मीठ हुई
फगुआ का संग है!
आज रंग है।

जाने कितने बरस बीते
मितऊ से बात किए ।
चढ़ाय लियो भाँग आज
कह देंगे दिल के राज
खींच लाएँगे आँगन बार
मिट जाँयगे बिघन खार-
लगाना तंगी को तंग है
आज रंग है।

14 टिप्‍पणियां:

  1. होली मानाने का गजबै ई ढंग है
    आज रंग है.

    रंग है त खेलें का भिनसहरे
    के आई के जागी
    ब्लागन के छोड़ के!
    कविता ही रंग और कविता ही भंग है
    आज रंग है.

    चहका मन चमक चम
    चौताल ताल नाचे तन

    ई पढ़ा है जब से
    मनवां बेताल हुआ
    खोपड़ी में चल रहा अलगे से जंग है
    आज रंग है.

    ....शुभ होली.

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  2. बहुत बेहतरीन!!


    ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
    प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
    पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
    खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


    आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

    -समीर लाल ’समीर’

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  3. आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.nice

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  4. बहुत सुन्दर रंग हैं होली के। आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.

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  5. बढ़िया प्रस्तुति ...
    होली पर्व पर शुभकामनाये और बधाई .

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  6. "पड़ोसी की साँस सूँघ
    तीत नीम मीठ हुई"
    क्या बात है !!!!!!!!

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  7. वाह, मेरे आगे तो गाँव का यह दृश्य नाच रहा है:

    बहका मन तिनक तिन
    ढोलक की धिनक धिन
    बाजे पखावज तड़बक-तड़बक ताता धिन
    घुंघरू पग बाँध लिया कलुआ लवण्डा
    उछल-उछल गाता जोगीरा हुड़दंग है
    पटपटात बाज रही चमड़े की चंग है
    ढीली ढाली चोली खोल रही अंग है
    आज रंग है।

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  8. लगाना तंगी को तंग है
    आज रंग है।

    शुभकामनाएं...

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  9. आपकी ऊर्जा को आपकी जिवटता को सलाम!!!

    होली ..की आत्मीय मुबारकबाद!!

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  10. वाह गिरिजेश जी,
    समाँ बाँध दिया आपने होली का।
    चढ़ाय लियो भाँग आज
    कह देंगे दिल के राज
    खींच लाएँगे आँगन बार
    मिट जाँयगे बिघन खार-
    लगाना तंगी को तंग है
    आज रंग है।
    मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आ गया
    हमसे खुल जाओ बवक़्ते मयपरस्ती एक दिन
    वरना हम छेड़ेगें रख कर उज़्रे-मस्ती एक दिन

    सादर

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  11. राति नींद नहिं आइ गोरि
    सपन साँवरे भर भर अँकवारि
    नशाय दियो उमंग है
    आज रंग है।
    ----------- यहाँ नशाय पर 'नसाय' ज्यादा सुन्दर
    बैठता क्योंकि देशज की भंगिमा तद्भव की मांग करती है यहाँ !
    संभव हो मैं ही गलत होऊं ! :)

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