रविवार, 20 नवंबर 2011

लगती हो


आभार:
 http://www.123rf.com/photo_4644624_indian-girl-catching-her-sari-in-a-bending-posture.html


जो पूछी बताता हूँ
अपनी सुनाता हूँ-
अमराई की पछुआ में
नशा छाँव महुआ में
नमकीन तीते टिकोरे कीखटाई सी लगती हो।

लूह चले चाम पर
परखन नाम पर-
जो दीठ से देखी न जाय
जीभ से कही न जाय
अधकच्चे रसाल कीभावी मिठाई सी लगती हो।

कने कने घाम में
सँवराई सी शाम में-
भटकन न नाप सके
डरा नहीं पाप सके
छूने की चाह जगाती, लजाती ललाई सी लगती हो।
.
.
.
छुट्टियों के दिन बीते
रह गये बखार रीते-
तड़पन जो ला न सकी
नेह लगन पा न सकी
सूने खलिहान लुटी, शहर की कमाई सी लगती हो। 

शनिवार, 12 नवंबर 2011

तुम इतने समीप आओगे.... बुद्धिनाथ मिश्र


तुम इतने समीप आओगे,
मैंने कभी नहीं सोचा था।

तुम यूँ आये पास कि जैसे, उतरे शशि जल भरे ताल में,
या फिर तीतर पाखी बादल, बरसे धरती पर अकाल में,
तुम घन बन कर छा जाओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था।
तुम इतने समीप आओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था॥

यह जो हरी दूब है, धरती से चिपके रहने की आदी,
मिली न इसके सपनों को भी, नभ में उड़ने की आज़ादी,
इसकी नींद उड़ा जाओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था।
तुम इतने समीप आओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था॥

जिसके लिये मयूर नाचता, जिसके लिये कूकता कोयल
वन वन फिरता रहा जनम भर, मन हिरना जिससे हो घायल
उसे बाँध तुम दुलराओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था।
तुम इतने समीप आओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था॥

मैंने कभी नहीं सोचा था, इतना मादक है जीवन भी
खिंच कर दूर तलक आये हैं, धन से ऋण भी, ऋण से धन भी
तुम साँसों में बस जाओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था।
तुम इतने समीप आओगे, मैंने कभी नहीं सोचा था॥

सनातन अधूरेपन के साथ सृष्टि को जो पूर्णता मिली है उसे मैं बड़े चमत्कारों में से एक मानता हूँ। इसके साथ ही संतुलन और विरुद्धों के सह अस्तित्त्व भी जुड़े हैं। जुड़ाव का तार है – राग। आयु के बढ़ने के साथ जब कैशोर्य आता है तो तन और मन के रसायन मचल उठते हैं। किसी की दीठ, किसी की आहट, किसी का स्वर, किसी की छाया, किसी का नाम, उसकी छोटी सी चर्चा भर रोयें गनगना देने के लिये पर्याप्त होते हैं। मन प्रांतर में कभी कभी किसी का आगमन अचानक ही होता है तो कभी धीरे धीरे! अगर इस चाहना का विस्तार हो, उदात्तीकरण हो तो मिलन की व्याकुल प्रतीक्षा ‘दुलहिन गावहु हो मंगलाचार’ में प्रकट होती है और अगर बस अपने को मिटा देने पर उतर आये तो वह आत्मविश्वास फूटता है – जहाँ में कैश ज़िन्दा है तो लैला मर नहीं सकती। स्वनिर्मित सभ्यता और प्रगति के दंश को सहने की शक्ति अगर किसी से मिलेगी तो रागात्मकता के विस्तार से ही – मनुष्य के पास और कोई औषधि नहीं!

इस गीत में बुद्धिनाथ जी राग गायन कर रहे हैं। वह कुछ जब अनायास अयाचित सा आ पहुँचता है तो आश्चर्यमिश्रित सुख अँगड़ाइयाँ लेने लगता है। प्रेमचक्षुओं के खुलते ही शिव शिवा का लास्य नृत्य दिखने लगता है। बुद्धिनाथ जी बिम्बधर्मी कवि हैं। रात के सन्नाटे में कभी ताल में प्रतिबिम्बित प्रकाशपुंज पर वर्षा की झीनी बूँदों को पड़ते हुये निहारिये! मनसर में शशि का उतरना समझ में आ जायेगा। अकाल ग्रस्त धरती फट जाती है। बंजर लैंडस्केप वाकई तीतर पंख के विस्तार सा दिखता है। वही दृश्य नभ में बन जाय तो? आप्यायित होने का आश्चर्य भरा अनुभव – गीतकार ने उसे बखूबी रच दिया है।

राग मुक्त करता है। जन्म जन्म के जड़ संस्कार टूट जाते हैं। जड़ताग्रस्त आत्मा के लिये जमीन से चिपकी दूब से अच्छा प्रतीक क्या हो सकता है? यहाँ कल्पना की उड़ान दर्शनीय है। हरी दूब नभ में! अरे सूख जायेगी!  तो क्या हुआ? सपनों को उड़ने की स्वतंत्रता मिले तो नींद ही उड़ जाय – अब इस विरोधी प्यारी सी बात के आगे क्या कहूँ? उस किसी का सामीप्य होता ही ऐसा है।

मयूर का नृत्य और कोयल की कूक निज के भीतर ही रहने वाले ‘जिस’ की अभिव्यक्ति होते हैं, बिना कस्तूरी का उल्लेख किये केवल  हिरन के घायल हो वन वन भटकने की बात कह, गीतकार ने ‘उसे’ सनकार दिया है। किसी के सामीप्य में ‘वह’ बँधता है। उस मुग्ध भाव का चित्रण देखिये जो प्रेममग्न प्रेमिका को निरखते उपजता है। कुछ कुछ निराला के राम के ‘खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन’ जैसा। यहाँ नागर संस्कार नहीं, वनवासी सरल उदात्तता है जिसे हिरन का बिम्ब बखूबी बयाँ करता है।

धन और ऋण। धन न हो तो ऋण न हो और ऋण न हो तो धन न हो। प्रस्तुति के दौरान गीतकार महोदय गणित विज्ञान की बात करते हैं। मैं कहता हूँ कि यह मूलभूत ‘अर्थशास्त्र’ है J ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ - अब ऐसी सम्पदा पाने पर ‘मद’ न हो तो लानत है सारे सद्गुणों पर! साँसों के सामीप्य की मादकता और दुर्गुण मद – मतमतांतर रहें अपनी जगह, यहाँ तो निहाल होना ही बनता है - जनम जनम की उधारी का हिसाब जो हो गया है!   
 विपरीतों का आकर्षण और फिर साँसों में बस जाना, इस प्रेम के घर की बात ही निराली है। इसी का विस्तार होने पर समूचा विश्व ही अपना हो उठता है। गोविन्द पधारते हैं - साँस साँस सिमरो गोबिन्द, मनिअंतर के चिन्द मिट जाते हैं। धन ऋण का यह खेल अनूठा है और अनूठा है यह गीत भी!  
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अब गीत सुनिये, स्वयं गीतकार के स्वर में: 


शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

न कुछ कह पाया है




मिलने पर तमाम बन्दिशें हाल-ए-दिल पुछवाया है 
देखे भी जो बयाँ न हो उसको अच्छा कहलाया है।

पीछे छूटा लम्बा रस्ता पाँव चले जो दूर तलक 
आगे की राहें मामूली कह कह खुद बहलाया है। 

गठरी की गाँठें मामूली भूल चुका अब खोले कैसे 
दवा बिना सूजे घावों को बस हाथों से सहलाया है।

न पढ़ना मेरी पाती को ऊपर झूपर लख लेना 
जिस सच को कह न पाया आखर आखर झुठलाया है।

घड़ी घड़ी तारीखें बदलें चार घड़ी की ज़िन्दगी
वक्त बेगैरत कठिन नजूमी कौन सही कह पाया है

 मगरूर मसाइल तमाम ज़िन्दगी छ्न्द पड़ गये छोटे हैं
चीख भरी खामोशी पर शायर न कुछ कह पाया है। 

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

आओ लक्ष्मी!


harsingar
आओ लक्ष्मी!
अमावस काली बहुत
नभ स्याह, नखत भर रहे आह
धरा फूले शुभ्र हरसिंगार,रह रह कराह
आओ लक्ष्मी!

फैली सुगन्ध, झूले केसर कदम्ब
भर किलकारी,
आओ लक्ष्मी!

कैसी समृद्धि?
रोग भरे अस्पताल
जन जन अपराध,
गले हार अजन्मे मुंडमाल
कुक्षि परीक्षण, गर्भपात,
कैसी ममता, कहाँ गर्भनाल?
सृष्टि शृंगार? उत्स संहार,
पूजन दीप जले चौबार
कृष्ण पथ बिछी आँख आँख,
रची रंगोली द्वार द्वार
भेद अन्धकार,
जगा कुंडलिनी सहस्रसार
खिलखिलाती
आओ लक्ष्मी!

जग जायँ, बन जायँ,
सँवर जायँ सबके भाग
आओ लक्ष्मी!

भूले माया, पुरुष बिना माय धाय?
कलुष विपदा हृदय हार,
लज्जा कहते अर्धनार
बुद्धि भोथरी, छल बल पाश,
असफल हाथ गहे काँप
पौरुष हीन शान,
लिखने अपने हाथ भाग्य
निकलो लक्ष्मी!

खंड खंड अंत पाखंड,
बुझें छलिये मोहन दीप
मुक्त करो मन मुक्ता आब,
सजें स्वाती साहस सीप।
आओ लक्ष्मी!

फूले धरा शुभ हरसिंगार,
फैली सुगन्ध, केसर कदम्ब
भर किलकारी,
आओ लक्ष्मी!

kadamb

शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

मुझे नहीं पता...


आयेगा वह दिन।
एक दिन आयेगा॥

पेट पालने को, मुँह में दाने को
देहों के गुह्यद्वार नहीं बिकेंगे
माँ के स्तन से चिपट चूसते शिशु को
दूध की जगह रक्त के क्षार नहीं डसेंगे।
निकले पेट लकड़ी से हाथ पाँव
पुतलों जैसे मिलेंगे खेतों में खड़े
पेट के तुष्टीकरण को आते
मूर्ख खगसमूह को भगाने को।
वे गलियों में नंगे नहीं घूमेंगे।

हवाओं में वह अम्ल नहीं होगा
जो बाहों की मछलियों को गला देता है।
नासा की राह फेफड़ों से होते पैरों में पहुँच
हड्डियों को यक्ष्माग्रस्त बना देता है।
धरती पानी से कभी नहीं लजायेगी
आदमी के पानी के दम हरदम लहलहायेगी।
बंजरता बस रह जायेगी एक शब्द सी
अकाल के साथ सिमटी शब्दकोष में
सपनों की दुनिया में जीते जवानों के भाष्य को।

उस दिन के बाद कोई आत्महत्या नहीं करेगा 
और इन्द्रों के हो जायेंगे आत्मापरिवर्तन 
(हृदय तो उनके पास होते ही नहीं
देह में रक्तप्रवाह के अभाव की पूर्ति 
वे रक्त चूस कर करते हैं)। 
धीमे, सुनियोजित नरमेध यज्ञ 
अवैध घोषित कर दिये जायेंगे
उनके लिये होगा मृत्युदंड - बस। 

मनुष्यों के भाग्य बन्द नहीं होंगे 
वृक्षों के परिसंस्कृत सफेद शवसमूहों में। 
मेज पर फाइलें चलेंगी 
उनके पैरों में लाल फीता बन्धन नहीं होंगे। 
प्रार्थनापत्रों पर टिप्पण हस्ताक्षरों में 
विनम्रता होगी, उनसे स्याही ग़ायब होगी 
वे रोशनाई में लिखे जायेंगे।  

त्याग, शील, लज्जा, ममता, सहनशीलता 
बर्बरता की कसौटी नहीं कसे जायेंगे। 
'घर एक मन्दिर' में नहीं गढ़ी जायेंगी
नित नवीन अश्रुऋचायें, जीवन के क्षण
नहीं होंगे सुलगते धुँआ भरे अनेक हविकुंड। 

'घर में शांति से रह पाना' दुराशा नहीं होगी 
और न उसके लिये नपुंसकता अनिवार्य होगी।
रोटी, कपड़ा और मकान के साथ उत्कोच 
जीने की मूलभूत आवश्यकता नहीं होगा। 
रचनाशीलता नहीं भटकेगी - 
सीवर, पानी और बिजली के ग़लियारों में। 
सूरज को उगने के लिये नहीं रहेगी 
रोज जरूरत नये घोटालों की। 

... वह दिन कवि की मृत्यु का होगा 
पन्नों पर न दुख होगा और न क्रांति की हुँकारें 
न ललकार होगी, न सिसकार होगी 
और न दुत्कार होगी। 

जीवन सुन्दर होगा, प्रेमिल होगा। 
कृतियाँ तब भी रची जायेंगी 
आनन्द के वाक्य तब भी रचे जायेंगे। 
मुझे नहीं पता कि उस युग में वासी उन्हें
कविता कह पायेंगे॥

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

आज की रात तुम्हें फिर पाना चाहता हूँ।

होठों की नमी के पीछे
दहकती पास प्यास
रेख रेख देख सकता हूँ
छू नहीं सकता - होठ सूखते हैं।

इतने निकट होना कि
साँसें दूर धकेलने लगें
और आँखें जीभ को सोख लें
कह नहीं सकता - होठ फटते हैं।

हवाओं को सहलाता हूँ
अंगुलियों से सुलझाता हूँ
चमकते चन्द रजत गुच्छे
बह नहीं सकता - आँसू रुकते हैं।

बुनता हूँ धागे जो अदृश्य हैं
कि पहना दूँ दिगम्बर तन को
जलती चाँदनी जलन से रूप पर
सह नहीं सकता - भाव बिंधते हैं।

न, वहीं रहो, दूरियाँ सुन्दर हैं
आज की रात बस सुन्दर है
निशा सहमेगी, भटकेगी यामिनी,
पर्याय हो रजनी करेगी राहजनी
कोई चिंता नहीं, दुख नहीं, सुख नहीं
लुटने लुटाने का भय नहीं
इतनी उठान कि उड़ना चाहता हूँ
इतनी थकान कि मरना चाहता हूँ।
आज की रात मैं बच्चे सा सोना चाहता हूँ

कुछ नहीं, खोया कभी नहीं
आज की रात तुम्हें फिर पाना चाहता हूँ। 

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे - बुद्धिनाथ मिश्र


गीत 

आभार :
http://tearswineandasuit.blogspot.com
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो। 

सपनों की ओस गूँथती कुश की नोक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवा लोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अँधेर में कैसे नेह का निबाह हो?
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है, 
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे, 
ऐसे में क्यूँ न कोई मौसमी गुनाह हो?
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

गूँजती गुफाओं में पिछली सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे? 
पग-पग पर लहरें जब माँग रहीं छाँह हो!
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!

कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत काँप रही आज है,
यूँ ही ना तोड़ अभी बीन रे सँपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो!
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे!
___________________________________ 

यह गीत किशोर वय की मेरी रागमयी स्मृतियों में से एक है। राजकीय इंटर कॉलेज के वार्षिक क्रीड़ा महोत्सव के साथ होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान इसे पहली बार सुना था। अंत्याक्षरी प्रतियोगिता हुई थी जिसमें फिल्मी गीतों का निषेध था । प्रतियोगियों को कविता, साहित्यिक गीत आदि सुनाने थे - मुखड़ा और एक अंतरा। जब इस गीत को एक छात्र ने स्वर दिया तो हाल में सन्नाटा छा गया और उसे गीत पूरा करने से किसी ने नहीं रोका। सच कहूँ तो जैसा कौशल और स्वरमाधुर्य उस बालक में था वैसा स्वयं कवि के स्वर में नहीं है। 
ओस मेरा एक प्रिय बिम्ब है। ओस सरीखे सपनों को जो कि जागरण के चन्द क्षणों के पश्चात ही उड़ जाते हैं, कुश में गूँथना एक बहुअर्थी बिम्ब है। कुश को पवित्र माना जाता है और ओस तो विशुद्ध शुद्ध होती ही है। कवि सपनों को प्रात के क्षणों की उस दिव्यता से जोड़ता है जो अत्यल्प काल में ही मन मस्तिष्क से तिरोहित हो जाती है लेकिन जिसकी स्मृति मन में रच बस जाती है - फिर फिर उभरने के लिये।

रेत के घरौंदे, सीप, अन्धेरा और नेह एक अनुभूतिमय बिंब है। कवि को नेह निबाह में अन्धेरा स्वीकार नहीं। जाने क्यों किसी के रूप की आब से रोशन अन्धेरा मन में आता है और पुन: ओस की बूँद (स्वाती जलद वारि नहीं) का सीप में मोती बन जाना  - लगता है जैसे कवि बहुत कुछ कहना चाह रहा था लेकिन छ्न्द बन्ध और टेक की सीमा ने रोक दिया! 

चन्द्र को घेरे मेघ और मौसमी गुनाह! कमजोर क्षणों में निषिद्ध आदिम सम्बन्धों के घटित हो जाने की ओर ऐसा मासूम और अर्थगुरु संकेत कम ही दिखता है। ज़रा सोचिये, बरसात हो गई लेकिन मन कमल के पत्ते सा अनभीगा रहा। पर आसमान अभी निरभ्र नहीं हुआ, उग आया चाँद अब उस ओर संकेत कर रहा है। आज क्या हो गया प्रिय तुम्हें? जो होता है, हो जाने दो!

हंस, झील, फेरे, लहरें और छाँह। आप ने ऐसा बिम्ब कहीं और देखा है?  फेरों में गति है, लहरों में गति है, पग में गति है लेकिन हर बाढ़ पर छाँह की चाह तो स्थिरता माँगती है! झील तो वहीं की वहीं है, लेकिन बेचारा उड़ता हंस! प्रेम क्या गति और स्थिति की घूर्णन सममिति को साधना नहीं होता? झील की लहरें अनंत हैं लेकिन हंस के फेरे तो अनंत नहीं हो सकते। हंस की सीमा है और प्रेम की त्रासदी भी यही है।

जिन लोगों ने पूरी रात को मधु यामिनी सा जिया हो, वे कुमकुम लाल सी निखरी भोरहरी लाज और तन मन की काँप को समझ सकते हैं। प्रेम का दंश - नागिन का मन अभी लुभने से नहीं भरा। सँपेरे! बीन की धुन न तोड़। प्रार्थना पराती नहीं कोई मादक पराती बजाओ। 
 एक भोजपुरी गीत 'छोड़ छोड़ कलइया सैंया भोर हो गईल, तनि ताक न अँगनवा अँजोर हो गइल' की स्मृति हो आई है और निराला के 'नैनों के डोरे लाल गुलाल' की भी। इन पर फिर कभी। 

और अंत में ... 
जाल, मछली और मछेरा। कवि ने इसे आशावादी गीत कहा है लेकिन यह तो पूरी तरह से रागवादी गीत है।
क्या हुआ जो असफल हुये? फिर से लहरों में जाल फेंको न! देह स्वयं नहीं बँधती, उसे बन्धन की चाह बाँधती है। 
_______________________________         
अब कवि के स्वर में गीत 


Buddhinath ek bar aur jal

यहाँ बुद्धिनाथ मिश्र का एक और गीत : धान जब भी फूटता है ...

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

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पहले भाग से आगे ...


मौत आसान है, जीना और भी आसान 
नेह के पल कठिन, सोचना और कठिन 
कुछ कर जाना महाकठिन। 
और दुनिया है कि लगता है 
इससे पहले आसानियाँ थी ही नहीं। 
सम्भोग के, जनने के
टाँग फैला जमीन पर बदबू करने के - 
आह! इतने अवसर पहले कहाँ थे?
  
खीर के दोनों को आतुर मातायें 
अब यज्ञ वेदी के पास फटकती नहीं - 
नहीं होतीं दिव्य अवतारी संतानें।

न करो उम्मीद कि मैं फँसूगा 302  या 307 में - 
प्रतिष्ठित महापंडित रावणों का वध? 
हा, हा, हा 
सिवाय खुद को मारने के, 
किसी की ओर तना आक्रोश 
आतंकवाद की एक और घटना होती है। 
अट्टहास करता एक रावण चुप हो 
मीठी जुबाँ कहता है - 
अब सिर्फ मैं ही बचा एक ईमानदार 
मुझे मारना मानवता पर महान संकट लायेगा - 
ईमान विषय हो जायेगा 
जेनेटिक इंजीनियरिंग का 
और बलात्कारों का आखिरी विशेषज्ञ 
स्वर्ग चला जायेगा - अप्सराओं के पास
जहाँ भोग और बलात्कार
स्वतंत्रता की उद्घोषणा की पहली धारायें हैं।   
मानवता जार जार रोयेगी 
जब कि चाम से चाम की रगड़ को सोच
हँस उठेंगी सारंगियाँ
और
इतिहासकार रचने लगेंगे 
एक और भोंड़ा सा मिथक।      


The moment when I come out of 
super specialty hospital 
Thinking how to control cholesterol 
and how to control that burning desire 
which burns loin areas of two bodies
Something flashes 
'they did not talk about celibacy'
I feel ashamed about myself 
I desire for fire
I desire to fire 
While still stuck up between these two fires - 
Economy takes twofold swings
It grows, it limps making millions neuter - 
Whole world is suffering from erectile dysfunction 
And population is growing, growing, growing on ... 
ज़िबह होने को।

हथियार होता है पैवश्त 
गले में 
टाँगों के बीच नहीं।
आश्चर्य नहीं कि खाद्य संकट नहीं है 
और प्रिंट, नेट, स्पैम सब, सब 
वियाग्रा के प्रचार से अटे पड़े हैं।  


They flood that street with blood 
wherever hunger walks - 
That is ultimate solution 
Die! 
please don't cry!! 
... sob 

(क्रमश:) 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

धान जब भी फूटता है गाँव में... बुद्धिनाथ मिश्र

किसानों के लिये उनके खेत परिवार के सदस्यों की तरह होते हैं और फसलें संतान सी। लिहाजा उनके आपसी व्यवहार भी उसी तरह से होते हैं। किसानी जीवन की इसी रागात्मकता को प्रख्यात गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र  का यह गीत अभिव्यक्त करता है। इसे श्री ललित कुमार ने भेजा। 



धान जब भी फूटता है गाँव में
एक बच्चा दुधमुँहा, किलकारियाँ भरता हुआ,
आ लिपट जाता हमारे पाँव में।  
धान जब भी फूटता है गाँव में॥ 

नाप आती छागलों से ताल पोखर सुआपाखी मेंड़ 
एक बिटिया सी किरण है रोप देती चाँदनी का पेंड़
काटते कीचड़ सने तन का बुढ़ापा, हम थके हारे उसी की छाँव में।
धान जब भी फूटता है गाँव में॥ 

धान खेतों में हमें मिलती सुखद नवजात शिशु की गन्ध
ऊँख जैसी यह गृहस्ती गाँठ का रस बाँटती निर्बन्ध
यह ग़रीबी और जाँगरतोड़ मेहनत, हाथ दो, सौ छेद जैसे नाव में।
धान जब भी फूटता है गाँव में॥ 

फैल जाती है सिंघाड़े की लतर सी, पीर मन की छेकती है द्वार
तोड़ते किस तरह मौसम के थपेड़े, जानती कमला नदी की धार
लहलहाती नहीं फसलें बतकही से, कह रहे हैं लोग गाँव गिराँव में।
धान जब भी फूटता है गाँव में॥  

कवि के स्वर में गीत का पाठ यह है: