बुधवार, 7 सितंबर 2016

नयन माँ के

नयन माँ के
हर पल थामे
भीत,
लिखा जिस पर
पिता का जाना -
अदृश्य मसि।

अंधेरे से भी
झाँकती है
हार,
पीर
दो थके नयनों की।

सपाट मुख
स्थायी भाव
विवर्ण हम
सो नहीं पाते
रो नहीं पाते।

प्रात: दिलासा देती है माँ
जाने दो, ठीक ही हुआ
मत सोचो..

और मुझे पता चलता है
अमा की रात
ओस झुलसी आग
कैसे शीतल होती है।

ताकने लगता हूँ आकाश
कि
उमड़े जो, थमे रहें
छिप जांय...
... माँ जाने कौन सा नया बोझ
नई हार
और पिरो लेगी आँखों में
बहें तो बहें
बस दिखें न।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

भूख वर्तमान

मँगतों और देवतों के देश में
अकाल से मरते थे लोग,
खाते पीतों के बीच भूख से नहीं।

उकताए बुद्ध तक ने
भूख को न माना दुख।

हम उन्नति कर गए
किन्तु आज भी
पचा नहीं पाते
भूख से मरना।

पोस्ट मार्टम और तराजू लगाते हैं
पेट से ककोर ककोर निकालते हैं
पचास ग्राम भात।
वर्ल्ड के सामने,
बैंक के सामने
चिघ्घाड़ते हैं -
नहीं मरा कोई भूख से!

इतिहास में -
वृकोदर सहमता है
पृथा भूल जाती है आधा कौर।
द्रौपदी के अक्षय पात्र
नहीं बचता साग तक
यादव की भूख
अल्सर में तड़पती है।
दुर्वासाओं के शाप फलते हैं
और हम ऐसे
... इतिहास को झुठलाते
आगे बढ़ते हैं।

रविवार, 12 जून 2016

चाहना

(1) 
जानती हो? 
पहले चुंबन को 
व्यक्त कर सके नहीं 
आज तक कोई सुर, 
कोई गीत, कोई कथा - 
हर थका
पहले मिलन की दुखन 
चाहता है कहना 
और निढाल होता है। 


प्रेम है 
क्यों कि मनुष्य गढ़ने में 
असफल है!


(2) 
उनकी हंसी
सिसकी। 
प्रेम अधमरा
देह ठठरी।
... बस इतने में - 
एक अरब गीत
दो खरब कहानियाँ
सदियों लंबी सिनेमाई रीलें
टेक टेर हेर फेर ... 
... ढाई आखरों में 
कुछ और टांकना 
बस होगा दुहराना... 
... नहीं पूरना मुझे वह कहानी
मैं कुछ रखे हुये मरना चाहता हूँ।

अहिवात

बियाह की आधी सदी पश्चात
पूस की थी रात
न पूत न पतोहू न नात।
जोड़ की पीर वात
तेल के साथ 
मला काँपते हाथ 
बूढ़े की सौगात
बुढ़िया ने जाना अहिवात।
बस इतनी सी बात
दिया आशीर्वाद
हो सात जन्मों का साथ।
समवेत हास
दो अकेले स्वर्ग-वास।

बुधवार, 20 जनवरी 2016

फिर मौत की चली या रब
उगआया कोई चुनावी परब।
नफरतें साजिशें आस्तीन में
मचलने लगीं हो संगीन बेढब।