रविवार, 8 अप्रैल 2012

एक काम रचना i.e. An Erotica

अंग्रेजी और हिन्दी दोनों में एक काम रचना (erotica) प्रस्तुत है। आप को यह बताना कि कौन सी मूल है और कौन सी अनुवाद?  अंग्रेजी और हिन्दी के क्रम बारी बारी से उलट दिये हैं ताकि मन किसी एक भाषा के पक्ष में केवल क्रम के कारण न हो जाय! 
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चूमा है जब भी मैंने तुम्हारे अधरों को Whenever I have kissed your lips
I have sensed openings somewhere else तुम्हें कहीं और खुलते पाया है
तुम्हारे निमंत्रित करते सुन्दर उरोज your inviting beautiful breasts
hide behind long black hair छिप जाते हैं प्रलम्ब कृष्ण केशराशि के पीछे
कई बार मेरी आँखों ने उन्हें सहलाया है many a times my eyes have caressed them.
many a times you have closed yourself कई बार तुमने स्वयं को गोपन किया है -
मेरी गोद में, मेरी बाहों में in my bosom, my arms
but never opened yourself लेकिन स्वयं नहीं हुई अनावृत्त कभी
मैं हमेशा चकित होता हूँ I marvel always
lips are open, breasts are open होठ खुले हैं, स्तन खुले हैं
यहाँ तक कि जघनस्थल भी है अनावृत्त even thighs are open
but you remain closed किंतु तुम बनी रही हो गोपन
विचित्र बात! शरीर अनावृत है queer ! the body is open 
and the mind is closed. और मन गोपन है। 





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चित्रों पर उनके फोटोग्राफर का कॉपीराइट है। इन पर न तो कोई मेरा अधिकार है और न ही स्वामित्त्व। ये यहाँ केवल रचना को सवर्णी रूप देने के लिये प्रयुक्त किये गये हैं।

8 टिप्‍पणियां:

  1. कोई पुरुष ऐसी सटीक नारी -अभिव्यक्ति का प्रगटन कर सकता है -आश्चर्यम आश्चर्यम !
    यही बात तो अभी उसी दिन उस कवयित्री ने कही तो जलजला आ गया ..
    प्रेम प्रगटन हमेशा एक उभय पारस्परिक सहभागिता की क्रिया-प्रतिक्रिया है .....एक परफेक्ट सिनर्जी !

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  2. erotica से ऊपर पहुँच कर पढूँ तो चलेगा!
    कहीं मूल हिन्दी ही तो नहीं! यदि सही हूँ तो पहचाना इस पंक्ति से---
    "..hide behind long black hair छिप जाते हैं प्रलम्ब कृष्ण केशराशि के पीछे ....

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  3. अरविंद जी,

    इरोटिका हो या ब्रिटानिका, हर एक चीज के कहने का सलीका होता है। जिस कविता पर बवाल मचा था क्या वह वाकई कविता थी ?

    गद्य को लाईन दर लाईन काट काट कर जमाना ही कविता है तो फिर क्या कहना :)

    सीधे सीधे गद्य के रूप में पोस्ट लिखी जाती तो भी चल जाता लेकिन कविता के नाम पर ठेलना.......इन्हीं सारी चिलगोजइयों के चलते मैंने नेट वाली कवितायें पढ़ना छोड़ दिया था कि न तो लोगों को कुछ कविता के बारे में पता है न पता करना चाहते हैं। बस कैसी भी अड़ी सड़ी कविता हो लोग वाह वाह कर देते हैं और किसी स्त्री द्वारा लिखी कविता हो तो इतनी जोर की वाहवाही होती है कि वा कहीं जाकर गिरता है और ह कहीं और जाकर।

    माना कि हर कोई कवि विधा में पारंगत नहीं है, कोई जरूरी भी नहीं है....लेकिन क्या यह जरूरी है कि बेतुकी पंक्तियों पर भी बाकी लोग भी हुआं हुंआ करते दिखें जबकि साफ मालूम हो रहा हो कि गद्य को तोड़ मरोड़ कर बस लिख दिया गया है क्योंकि लिखने वाले को पता है कि वह कुछ भी लिखे लोग वाहवाह करेंगे ही :)

    ------इस चक्कर में गिरिजेश जी की पोस्ट पर लिखना भूल ही गया।

    हां, भई गिरिजेश जो लिखा अच्छा लिखा.......जो कुछ पूछा अच्छा पूछा.......अ लेकिन ये कवि है कौन जिसने झूलेदार इरोटिका लिख मारा :)

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  4. आप लोग भी कैसी बहस में लग गये! अरे प्रश्न का उत्तर दीजिये। कवि तो नहीं, रचनाकार स्वयं को ही समझ लीजिये।

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  5. समझ नहीं आ रहा है, पर पढ़ना एक अनुभव था, दोनों भाषाओं में।

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  6. कई बार मेरी आँखों ने उनका आलिंगन किया है many a times my eyes have caressed them.

    मेरा अनुवाद होता : “कई बार मेरी आँखों ने उन्हें सहलाया है”

    मूल कविता अंग्रेजी में रही होगी। क्योंकि नीचे की लाइन इसकी गवाही दे रही है :
    but never opened yourself लेकिन स्वयं नहीं हुई अनावृत्त कभी
    मन की किवाड़ खोलने में और अनावृत होने में थोड़ा अन्तर है। :)

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  7. @सतीश पंचम जी,
    किस कविता पर बवाल मचा था भाई। मुझे भी लिंक मिलता तो थोड़ी आँच महसूसते।

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