रविवार, 21 मार्च 2010

डरो नहीं

डरो नहीं - प्रेम जीवित रहेगा।
मृत्यु के बाद भी।
बिछड़ने के बाद भी।
तारे के उल्का हो जाने के बाद भी।
चाँद तारों के पार प्रेम जीवित रहेगा -

मैं मैं न रहूँगा
वह वह न रहेगी।
..बहुत दिनों बाद जब याद करेंगे
प्रेम फैलेगा मुलायम चाँदनी बन
याद को आकार देते हुए -

अँधेरे में आकार कहाँ होते हैं?
अँधेरे में डर लगता है । 
चाँदनी ! 

12 टिप्पणियाँ:

Arvind Mishra ने कहा…

कई बिम्ब और चेहरे , चाँद और चांदनी मन में फ्लैश हो गए! और रात में संचरण तथा अभिसार तक

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर काव्य! प्रेम अमर है।

वाणी गीत ने कहा…

मैं मैं न रहूँगा
वह वह ना रहेगी
फिर भी प्रेम रहेगा ....
रहा है ....
चाँद तारों के पार भी ...

कैसे रहेगा प्रेम जीवन मृत्यु को लांघ ...(हिमांशु की कविता ) ...पढ़ी है ..??

बेचैन आत्मा ने कहा…

जितना प्यारा
डर
उतना अच्छा
उत्तर
गिरजेश राव
बढ़ा देते हैं
कविता का भाव
भाव?
मूल्य नहीं....
संवेदना का विस्तार
आखिर इसी से तो बढ़ता है
परस्पर प्यार!
,,,अच्छी कविता के लिए बधाई.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी कविता जी. धन्यवाद

'अदा' ने कहा…

तथास्तु...!!
आमीन !!
ऐसा ही हो..!!

सतीश पंचम ने कहा…

@ डरो नहीं - प्रेम जीवित रहेगा।

@ अँधेरे में आकार कहाँ होते हैं?

शायद इसीलिये अंधेरे में भीम खीर खा पाये थे और दुनिया ने जाना कि वह कितने खीर प्रेमी थे :)

बढिया लिखा।

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

डरो नहीं - प्रेम जीवित रहेगा।
मृत्यु के बाद भी।
बिछड़ने के बाद भी।
तारे के उल्का हो जाने के बाद भी।
चाँद तारों के पार प्रेम जीवित रहेगा -
...........मनभावन.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

आपकी कविता को बहुत निजी स्तर पर महसूस रहा हूँ !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

तारे के उल्का हो जाने के बाद भी।
चाँद तारों के पार प्रेम जीवित रहेगा -
....इतनी दूर की कोड़ी?
बिल्कुल अलग अंदाज़...आनन्ददायी.

संजय भास्कर ने कहा…

मूल्य नहीं....
संवेदना का विस्तार
आखिर इसी से तो बढ़ता है
परस्पर प्यार!
,,,अच्छी कविता के लिए बधाई.

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com