शनिवार, 20 मार्च 2010

पुरानी डायरी से - 18: अधूरी कविता

रजनी का पक्ष कृष्ण
बेला है भोर की ।
चंचल मन्द अनिल नहीं ऊष्ण
कमी है शोर की।


अपूर्ण चाँद ऐसा लगता
अन्धकार को दूर करने हेतु
जैसे जला दिया हो प्रकृति ने
एक शांत दिया।


श्वेत बादल ऐसे चलते
इस दीप के उपर से
जैसे हों इस दीप से निकले
पटलित धूम।


इक्के दुक्के तारे निकलते
इनके बीच से
जैसे खेल रहे हों बच्चे
आँखमिचौनी गरीब के।

10 टिप्पणियाँ:

'अदा' ने कहा…

सुन्दर..!

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

इक्के दुक्के तारे निकलते
इनके बीच से
जैसे खेल रहे हों बच्चे
आँखमिचौनी गरीब के.....
वाह भइया वाह, गजब का लेखन-गजब का भाव. ...

शोभना चौरे ने कहा…

bahut khoob ashavadi rachna

मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 ने कहा…

bahut behatrin maja aa gaya padhkar

Arvind Mishra ने कहा…

अच्छा दृश्य कोलाज
सांझ सकारे !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

खटिया पर लेटा हलकू
कूकुर की झाँव-झाँव सुनकर
टूट गयी नींद को समेटता हुआ
लुंगी बाँध, कन्धे पर गमझा डाल
चल पड़ा खेत की ओर,
डंडा संभाले

जैसे जीवन का चक्र
रोज ही चलता है सूरज के साथ
चन्दा के साथ

कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…

सुन्दर.......
.....
.......
हे गौरैया....तुम मत आना
आज है विश्व गौरैया दिवस....
पर तुम मत आना...भूल कर भी मत आना
..............
http://laddoospeaks.blogspot.com/

शरद कोकास ने कहा…

जैसे खेल रहे हों बच्चे/आँखमिचौनी गरीब के .. राव साहब इस बिम्ब पर मैं कुर्बान जाऊँ ...।

संजय भास्कर ने कहा…

वाह भइया वाह, गजब का लेखन-गजब का भाव. ...

संजय भास्कर ने कहा…

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।