शनिवार, 6 मार्च 2010

पाखी ! न बोल।

पाखी !
न बोल साखी 
हवा साखी 
पेंड़ साखी 
मानुख न सुनेगा
न आएगी बारी 
पाखी न बोल -
साखी।

छाँव सूखे
पत्ते इकठ्ठे 
कोई न बैठे  
जो सुने साखी 
न बोल -
पाखी।

न बोल 
बच्चे - 
नहीं किलकते ।
एनीमेशन 
उम्दा पाखी  
सम्मोहित देखते
आँखें निकलीं 
पसरी खामोशी 
आवाज चहचह 
इलेक्ट्रॉनिक -
पाखी न बोल। 

तेरे बोल 
कभी गीत
कभी साखी
कभी लोरी
कभी फुसलावन
कभी बस मनभावन - 
थे - 
अब नहीं हैं । 
... बहरे हैं -
पाखी न बोल। 

6 टिप्‍पणियां:

  1. मानुख न सुनेगा
    न आएगी बारी
    पाखी न बोल -
    साखी।
    ....वाह!

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  2. एकदम मनबोल कविता है।

    चित्र के साथ नॉस्टॉल्जिया खनखना उठा।

    एकदम मस्त।

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  3. पाखी तू बोल
    हिय-मर्म खोल
    कोई सुने न सुने
    बाऊ सुनेगा !
    कविता में गुनेगा !
    .
    साखी बनेगी स्याही
    सियाही सियाही !
    आलोकित होगा
    थका - हारा - राही !
    ....... पाखी तू बोल ,,
    ....... हिय - मर्म खोल ,,
    .
    मिट जायेंगे सब
    उजड्ड , उजबक !
    तेरी नासर्गिकता का
    कोई न मोल !
    ......... पाखी तू बोल ,,
    ........... हिय - मर्म खोल ,,
    .
    आभार बाऊ !!!!!!!!!!!!!!!

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  4. बच्चे -
    नहीं किलकते ।
    एनीमेशन
    उम्दा पाखी
    सम्मोहित देखते
    आँखें निकलीं
    पसरी खामोशी
    आवाज चहचह
    इलेक्ट्रॉनिक -
    पाखी न बोल

    बेहतर पंक्तियां...

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  5. "पाखी तू बोल
    हिय-मर्म खोल
    कोई सुने न सुने
    बाऊ सुनेगा !
    कविता में गुनेगा !"

    यही कह दूँ ! अदभुत !

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