बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

लिपटना

कँटीले शमी से लिपटी है कोमल बेल
लटक़ रही हैं फलियाँ।

हमारा लिपटना याद आया है
क्या होता जो हम न लिपटते?
काँटे तब भी होते
फलियाँ तब भी होतीं ।

लेकिन वो बात कहाँ होती?
याद कहाँ होती?
जो बस खिंच आई है ऐसे ही
यह मुस्कान कहाँ होती?

11 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन वो बात कहाँ होती?
    याद कहाँ होती?
    जो बस खिंच आई है ऐसे ही
    यह मुस्कान कहाँ होती?
    गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

    बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

    कभी 'आदत.. मुस्कुराने की' पर भी पधारें !!

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  2. काँटे तब भी होते
    फलियाँ तब भी होतीं ।

    वाह क्या कहने. सानिध्य के सामंजस्य की बात ही कुछ और होती है .

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  3. @
    जो बस खिंच आई है ऐसे ही
    यह मुस्कान कहाँ होती?
    ...जीवन को गतिमान रखने की ऊर्जा यहीं से मिलती है.

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  4. राप्चिक कविता है जी...एकदम राप्चिक।

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  5. क्या होता जो हम न लिपटते?
    ..इस एहसास को जीने के लिए खुद भी लिपटना तो पड़ता ही..

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  6. मतलब ये कि जो उधर चल रहा है वो 'यादें' हैं. :)

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  7. कहाँ से बचाए रखे हैं इन अनुभूतियों को ! मौके पर ढेर कर देती हैं ! जियें सरकार ! ईर्ष्या होना स्वाभाविक है !

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