गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

तुम्हारी लम्बी बीमारी

(1) 
तुम्हारी लम्बी बीमारी 
अरगनी पर टँगे सूखते सूखे कपड़ों सी।
नहीं हटा पाया उन्हें, भीगने भिगोने का डर है।

(2) 
कपड़ों में भीनी ओस
रोज उड़ जाती है गुनगुनी धूप में ही।
कोई ठौर नहीं, मेरे आँसू बस उमड़ते रहते हैं।   

(3) 
तुम पूछने लगी हो अब
रोटियाँ नमकीन क्यों लगती हैं?
क्या कहूँ? आँसू बस रसोई में बरसते हैं!
  

  

10 टिप्‍पणियां:

  1. रोटियाँ नमकीन क्यों लगती हैं?
    क्या कहूँ? आँसू बस रसोई में बरसते हैं!

    अति सुन्दर!

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  2. सच्ची बात लग रही है ये रचना. कल्पना कम... आस पास का ज्यादा.

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  3. रोटियाँ नमकीन क्यों लगती हैं?
    क्या कहूँ? आँसू बस रसोई में बरसते हैं!
    बड़ी वजनदार पंक्त्यियाँ.

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  4. बिम्बों का इतना बेहतरीन इस्तेमाल है कि वाह वाह कहने भर से काम नही चलेगा , इन बिम्बों के नये अर्थ ग्रहण करने ही होंगे ।

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  5. बहुत सुंदर कविता। इतने कम शब्दों में इतनी गहरी बात, इतने सुंदर बिंब!

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  6. और क्या कहूँ--

    प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी
    बाँध देती है
    तुम्हारा मन, हमारा मन ,
    फिर किसी अनजान आशीर्वाद में-
    डूबकर
    मिलती मुझे राहत बड़ी !
    (स्व० धर्मवीर भारती जी की पंक्तियाँ )

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