गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

साथी हाथ थाम

साथी हाथ थाम। 

भोर के द्वार पर प्राची में दीप है
पसर गया लहलह माँग का सिन्दूर है। 
बटुर गया समय,
देह के वितान पर सफेदी भरपूर है।
कल मेंहदी रचाई थी! 
साथी हाथ थाम।

धूप भीगी और सूख गई, ढलना है।
हो चुका विस्तार बहुत, सिकुड़ना है।  
क्या हुआ जो मुक्ति की राह में, 
नाच रहे प्रेत हैं, चलना है। 
साथ होना काफी नहीं 
साथी हाथ थाम।

ये जो दरक रही है, छत नहीं, हम ही हैं ।
ये जो मौन है, सम्वाद नहीं, हम ही हैं। 
ये जो रोटी है, स्वाद नहीं, हम ही हैं। 
मेरे भी काँप रहे हैं, तुम्हारे भी काँप रहे हैं।
साथी हाथ थाम।  

पूर्णिमा है, ठंड है, एकांत है। 
मन के ज्वार फिर भी शांत हैं 
बहुत दिन हो गए दाह से सीझे हुए ।
कपोल पर कपोल तो ठीक है
पर साथ स्वेदहीन है 
साथी हाथ थाम। 

17 टिप्‍पणियां:

  1. @ अरविन्द जी :)
    इसीलिए तो हाथ थामने की आवश्यकता है!

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  2. कल मेंहदी रचाई थी!
    साथी हाथ थाम।
    मेहन्दी रचे हाथ ... साथी का साथ ...
    सुन्दर .. बहुत सुन्दर

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  3. ये जो दरक रही है
    छत नहीं
    हम ही हैं ।
    ये जो मौन है
    सम्वाद नहीं
    हम ही हैं।

    यही समझने की जरूरत है....

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  4. हो चुका विस्तार बहुत, सिकुड़ना है...
    बात पते की।

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  5. ये जो शब्द हैं
    ये जो बिंब है
    ये जो कथ्य है
    ये जो तथ्य हैं
    ये जो धर्म है
    उसका जो मर्म है

    वह सब सुलझा दे, समझा दे,
    तो मन को आये आराम
    साथी हाथ थाम

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  6. सुना है कल भौजाई आप को डांट रहीं थीं....कहीं ये कविता उसी वजह से तो नहीं न प्रस्फुटित हुई है :)


    कविता सुंदर है, एकदम सहज प्रवाह लिए हुए।

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  7. हृदयस्पर्शी! सुदर्शन फाकिर की पंक्तियाँ याद आ गयीं:
    चंद मासूम से पत्तों का लहू है फाकिर [कल]
    जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं। [आज]

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  8. @ Satish Pancham
    :)

    @ Abhishek Ojha
    You should write your love story. Come on Sir!
    How can you say हाथ थामने की सनसनी सब कुछ बदल देती है.!

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  9. @ चंद मासूम से पत्तों का लहू है फाकिर [कल]
    जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं। [आज]

    That is another dimension. Great. Thanks.

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  10. '' ये जो दरक रही है
    छत नहीं
    हम ही हैं ।
    ये जो मौन है
    सम्वाद नहीं
    हम ही हैं।
    ये जो रोटी है
    स्वाद नहीं
    हम ही हैं।
    मेरे भी काँप रहे हैं
    तुम्हारे भी काँप रहे हैं।
    साथी हाथ थाम। ''
    --- बेजोड़ पंक्तियाँ लगीं ! समझिये मेरे बुझे हुए मन को आपने माहुर खिला दिया ! सहज ही मार डाला , मियाँ ! मियाँ-मल्हार !!

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  11. धूप भीगी
    और सूख गई,
    ढलना है।
    हो चुका विस्तार बहुत
    सिकुड़ना है।
    क्या हुआ जो
    मुक्ति की राह में
    नाच रहे प्रेत हैं,
    चलना है।
    साथ होना काफी नहीं
    साथी हाथ थाम।
    ....जीवन संघर्ष के बाद कवि अब मुक्ति संघर्ष की राह पर चल पड़ा है...जानता है कि यह मार्ग और भी कठिन है मगर हार नहीं मानता..कहता है, अभी तक तो तुम मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चल ही रही हो..साथ देती हो..साथ रहती हो..मगर अब मुझे तुम्हारी और भी जरूरत है...साथी हाथ थाम।

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