मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

अपुरुष सूक्त

सहस्रशीर्षा ....
... ब्राह्मणो मुखमासीद्....
ऋषि !
होगा तुम्हारा पुरुष सृष्टि उत्पादक
हजारों सिरों वाला -
बॉस की रोज रोज की घुड़की से तंग आ
एक दिन
मेरे इकलौते सिर ने आत्महत्या कर ली।

उग आते हैं मेरे हाथ
लोकल बस और ट्रेन में चढ़ते हुए ।
उतरते हुए झड़ जाते हैं।
दोनों बगल झूलते हैं फाइलों के बस्ते
जिनसे लटकते लाल धागों पर
हजारो खुदकुशियों के निशान हैं।

पापी पेट के लिए
मेरे पैर खड़े रहते हैं हमेशा
बी पी एल राशन की दुकान पर।
फर्जी राशन कार्ड की कमजोरी
उनमें डगमगाती है -
द्रोण नहीं मैं
न मेरा लाल अश्वत्थामा
जो दूध की जगह
पानी में आटे को घोल
पिलाने पीने से
महाभारत के सेनापति महारथी
पुष्ट हों हमारे भीतर -
 मर चुके क्रोध पर मेरे विलाप से
शांति भंग की आशंका रहती है।

धुँधलाती सिर विहीन नज़र -
चश्मे का शीशा पावरलेस
बिटिया की बढ़ी फीस की पर्ची
दूर कर बाँचते
कल बहुत उदास हुआ ।
उसे कुछ महीने और
नहीं मिलेगा रिटायरमेंट।

ऋषि !
ब्याह कर आई मेरी 'शांती'
बहुत सुन्दर थी।
तुम्हारे शांति पाठ को जपते
मैं अटक जाता हूँ
'ओषधय: शांति:' पर
कि
कमर दर्द, थायरॉयड, प्रदर
की लिस्ट में न जुड़े
उसे कुरूप बनाती एक और बिमारी।
'ओषधय: शांति:'
शांती!
शांति: शांति: ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. समझने की कोशिश में लगे हैं, महाराज...फिर पढ़ते हैं.

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  2. वाह! ऋग्वेद को जब गिटार पर साधा जाये तो जन्म लेती है, ऐसी सुन्दर रचना।
    काश मैं ऐसा फ्यूजन लिख पाता!

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  3. मिथकों का बहुत अच्छा प्रयोग करते हैं आप । और अंगों की खुदकुशी का विचार तो बेहतरीन है । मुझे सर्वेश्वर जी की एक कविता याद आई .." सर तो मै भूल आया दफ्तर में / हाथ रह गये बस मे........... और इस तरह मैं विदेह होकर घर लौटा ।"

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  4. गिरिजेश साहब,
    हम तो बस सोचते ही रह जाते हैं, इतनी वेदना.....।

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  5. शब्दों का चक्रवात चल रहा, भावों का बवंडर है
    आपकी कविता प्रासाद सरीखी मेरी टिप्पणी खंडहर है ...
    बहुत सुंदर....निशब्द हूँ.....!!

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  6. निम्न मध्यबित्त नौकरी पेशा आदमी का आज यही हाल है ! जिवंत चित्रण किया है आपने ! बढ़िया !

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  7. मर चुके मेरे क्रोध पर
    शांति भंग होने की आशंका है ...
    मर कर जन्म लेना क्रोध का प्रेत योनि में ...
    इसका तांडव क्या कम अशांति प्रसारक है ...

    सर विहीन फाईलों में लटका लाया खुदकुशियों के निशाँ ...राशन की लाईन में खड़ा , बिटिया की फीस को धुंधलाती ऐनक से देखता ,
    आम आदमी संग चल रहा इस कविता के ...

    महान ...!!

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  8. superb!! एक आम आदमी ऐसे ही रोज़ मर रहा है... यही क्रान्ति है, यही ज़िन्दगी..

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