शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

ब्लॉग ही मिटा दूँ !

वे भी क्या दिन थे !
जब विचार बस विचार थे 
न छपने की आस 
न कहने को साँस -
घुटते थे या नहीं - नहीं पता
पर अपने थे
बस अपने ।
कहीं था यह भरोसा
जिस दिन उजागर होंगे
क्रांति होगी
होगा संसार उलट पलट 
और
न रहेंगे कहीं कोई दु:ख।
...
इतने अक्षर,इतने शब्द,
झाँपी भर भर वाक्य
विराम, अनुच्छेद, टिप्पणियाँ  - 
सब मिल 
कर बैठे गोपन का चीरहरण 
और
संसार वैसे का वैसा ही रहा 
है 
दु:ख ही दु:ख 
क्रांति अभी भी क र आ न त इ
ये हाइवे, ये ओवरब्रिज, फोर लेन 
माल साल, हेन तेन, रेलम पेल
खम्भे गड़ते जा रहे हैं - 
और संसार वैसे ही कुत्ते की माफिक 
खम्भों पर मूते जा रहा है ।
सामूहिक वस्त्र हरण के बाद 
विचार नंगे शरमा रहे हैं 
कुछ भी नहीं जो दर्शनीय हो
कमनीय हो
विधाता की अनुपम सृष्टि 
मधु मधुर मदिर दिर दिर 
कुछ तो नहीं
कुछ भी तो नहीं
सोचता हूँ - 
ब्लॉग ही मिटा दूँ। ...
उससे क्या होगा ? क्या होगा उससे ?? 

20 टिप्‍पणियां:

  1. ab kya kahun sir bilkul sahi kaha...blog bhi aaksep...mauj masti hi bankar reh gaye...maadhurya samapt ho gaya...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  2. hmmm.. rukiye sochne diziye.. hmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
    ek kaam kariye blog mat mitaiye.. un logon ki rachnaayen saamne laaiye jo aapke pas-pados ya shahar ke gumnaam magar achchhe lekhak hain aur na hi blog ke bare me kuchh jante hain, na internet ke bare me. wo log jo umra ke aakhiri padav me pahunch gaye aur aajeevan sahitya-sadhna karne ke baat bhi jinhe apekshit naam ya shohrat nahin mili. jo hindi ki sewa to karte rahe lekin log unse tanik bhi parichit nahin, laaiye unki rachnaayen laaiye.. kabhi man ho aur koi samasya aisi lage jispar apne vichar dena chahen to kabhi-kabhi wo bhi daalen.
    ya ye sirf ek kavita hai to is lecture ke liye kshama karen aur jo maine kaha wo bhool jayen..
    ya mere sang gaayen ki- 'apne liye jiye to kya jiye.. tu jee aye dil zamane ke liye' :)

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  3. सितारों के आगे जहां और भी हैं...।
    आभार..।

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  4. गहरी निराशा के पल हैं ...
    ये वक़्त भी गुजर जाएगा ...

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  5. हद है अब आप भी ....इट्स मोस्ट अनलायिक ऑफ़ अ यंग मैंन नेम्ड गिरिजेश -ना दैन्यं ना पलायनम ...यावत् कंठ गतः प्राणः तावत कार्य प्रतिक्रया ....
    ....चालू रहें ...कुछ समाधान सोचते हैं ....
    ब्लॉग जगत आपको एक आशा और विश्वास के साथ देख रहा है -आप भी दुमदार हो गए तब ?
    लोगों के आस और विश्वास की खातिर ......

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  6. होगा क्या..कुच्छु नहिं...बाहर आईये जी इससे..आप कब से हमारे धारे में चलने लगे? :) मुस्कि मारिये और कोई चौचक रचना लाईये.

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  7. कहीं था यह भरोसा
    जिस दिन उजागर होंगे
    क्रांति होगी
    होगा संसार उलट पलट
    और
    न रहेंगे कहीं कोई दु:ख।
    .......................

    कुछ भी नहीं जो दर्शनीय हो
    कमनीय हो
    .....................
    सोचता हूँ -
    ब्लॉग ही मिटा दूँ। ...
    उससे क्या होगा ? क्या होगा उससे ??

    ...अति सर्वथा दुखदायी होती है। यूँ ही लिखते रहिए। क्रांति भले न हो ठहरे पानी में लहरें तो उठ ही रही हैं।

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  8. हालात इतने बुरे नहीं हैं। जब किसी से कुछ नहीं होना है तो अपनी सकारात्‍मकता में क्‍यों कमी लाएं ? होगा अवश्‍य बेहतर ही होगा।

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  9. इतनी जल्दी..क्रांति की अपेक्षा??...उम्मीद कुछ ज्यादा ही नहीं ?...सतत और अथक प्रयास जारी रहेंगे तब सूई की नोक बराबर परिवर्तन दिखेगा....विचारों को अनावृत तो करना ही होगा ...वरना सब ऐसा ही सोचेंगे तो दुनिया एक कदम आगे बढ़ने के बजाय सौ कदम पीछे नहीं चलने लगेगी??

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  10. कर बैठे गोपन का चीरहरण
    और
    संसार वैसे का वैसा ही रहा

    यहाँ सरकार बदलने में पाँच साल लगते हैं, और आप संसार को इतनी तेजी से बदलना चाहते हैं। संसार बदल रहा है, पर धीमी गती से।

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  11. आपको नब्बे से ज्यादा कविता पोस्टें लिखने के बाद लग रहा है। हमें तो पांच सात पोस्टें लिखते ही यह लग रहा था!
    पर बेशरमी है कि चले जा रहे हैं। :-(

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  12. लगता है हिंदी ब्लोगिंग के दिन खतरे में हैं.............हर कोई ब्लॉग को छोड़ने और ब्लॉग बंद करने की धमकी दे रहा है.............
    सोचो सोचो सोचो
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  13. कुच्छो ना होई... नीचे की तीन लाइनों को मिटा दीजिये. बहुत अच्छी कविता है.

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  14. स्वान्तः सुखाय लिखें । औरों को अपना मधु ढूढ़ने दें ।

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  15. प्रवीण जी की बात से सहमत.. बाकी ये बात सही है कि आपके और हमारे लिखने से क्रान्ति नही आयेगी.. लोग खम्भो पर पैर उठाकर ही मूतेंगे... बस एक काम अच्छा रहेगा.. आपके भीतर का इन्सान ज़िन्दा रह जाये शायद.. वही बहुत होगा आपकी क्रान्ति के लिये..

    यकीन मानिये उसका ज़िन्दा रहना बहुत जरूरी है.. मै आपको पढता रहता हू.. बज़ पर पीडी काफ़ी कुछ शेयर करता है. कभी कभी मै भी.. आपका ब्लाग शायद IE6 aur Firefox मे नही खुलता है इसलिये ओफ़िस से पढ तो पाता हू.. टिपिया नही पाता..

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  16. हम हैं आपके साथ - सीखने और झगड़ने दोनों के लिए - !
    हाँ दुःख तो होता है पर पर जीवन में इसे स्थाई - भाव न बनाया जाय !

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  17. अंतिम दो पंक्तियाँ पढ़ रहा हूँ..
    "...सोचता हूँ -
    ब्लॉग ही मिटा दूँ। ...
    उससे क्या होगा ? क्या होगा उससे ?? "


    उत्तर मिल रहा है.."उससे क्या होगा ? क्या होगा उससे ??"

    आप तो ऐसे न थे ! जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा ...!

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