रविवार, 11 अप्रैल 2010

आभार: नवीन रांगियाल - टूटे हुए बिखरे हुए

बैचैन सा घूमते घामते आज नवीन रांगियाल जी के ब्लॉग औघट घाट पहुँच गया।
लगा जैसे टहलते टहलते शहर से बाहर आ गया हूँ। ... किशोरावस्था का वह रामकोला टाउन से बाहर धर्मसमधा तक आ जाना। गहन शांति। घाट पर बैठ पानी में पैर डाले चुपचाप देर तक लहरों को निहारते रहना - अकेले।.. बस वही स्थिति हो गई। पढ़ता गया, पढ़ता गया चुपचाप।
उनकी अद्यतन पोस्ट कविता टूटे हुए बिखरे हुए   के शब्दों को बस पुंनर्व्यवस्थित किया और देखिए न कैसे एक रिश्ते की बुनावट होती दिख गई !....  हिन्दी ब्लॉगरी में जाने कितने रत्न ऐसे ही छिपे पड़े हैं। आप लोग भी ढूढ़िए न !

पसीना
देह गन्ध
शहद नमक पुती जबान 
गहरा पसरा मौन
जिस्म उतार 
हम रूह सूँघ रहे थे
रिश्ते बुन रहे थे
चुप चाप।

7 टिप्‍पणियां:

  1. एक बहुत ही अच्छा लिंक देने के लिए आभार!

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  2. बहुत गहरी रचना ढूंढ कर लाये, आभार लिंक का.

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  3. वाह.. और चे गवेरा को देखकर हम नही डरे.. औघट घाट की फ़ीड रीडर से जुड गयी है.. आभार..

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