शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

अपनी करवटों को सुलाता रहा हूँ।

चिट चटर चट
हवा आँगन पर तनी
चद्दर चैट चीत बात।
कहीं दूर चौकीदार की सीटी
टिर्र टिर्र
कम्प्यूटर टेबल से आती
चिर्र चिर्र 
लकड़ी धीरे धीरे हो बुरादा
झड़ रही ज़िन्दगी सी।
गाती हवा लोरी
सहला सहला
चाँद की चादर  ओढ़
सोए हैं पार्क में फूल बन्द ।
सनसना रहा पंखा छत पर
पूजा कोण से नील प्रकाश
कटता पुन: पुन:
बगल में पड़ी पुस्तक के अक्षर
बाँच रहा पुन: पुन: ।
बन्द है नाक
तलवा जैसे जम गई हो साँस
इचिंग पूरे चेहरे पर
त्वचा और मांस के बीच कहीं
खुजला भी नहीं पा रहा
खींचता साँस बरमंड
निर्वात भरती पीड़ा।
इलेक्ट्रॉनिक घड़ी
खच्च खच्च 
धीमे धीमे
समय को रोक
मरोड़ रही
चैन का गला।
खर्राटों भरा
कमरा बगल का
एसी और कूलर ध्वनि
द्वन्द्व द्वन्द्व
नींद कड़ुवा रही
आँख मन्द मन्द ..

कितनी रातें यूँ ही जागता
अपनी करवटों को सुलाता रहा हूँ।

13 टिप्‍पणियां:

  1. कविता में पंक्तियों की बढती घटती लम्बाई कोई आकृति बना रही है क्या?

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  2. कितनी रातें यूँ ही जागता
    अपनी करवटों को सुलाता रहा हूँ।

    करवटें भी तो तभी सो पायेंगे जब आप सोयेंगे.
    बहुत सुन्दर

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  3. अकेले का संगीत नाद -
    करे वक्त यूं ही बर्बाद !
    उफ़ सांझ सकारे का अहसास
    मुला मिलने की न कोई आस
    अनाटामी आफ लोनेलिनेस
    उपजाती कैसी सायकोसिस
    परानायड विच्श्रिनखल सा वजूद
    कब हो सके सब कुछ मौजूद ..
    जो हमने चाहा .....

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  4. सुन्दर भावों से सजी कविता के लिए बधाई!”

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  5. पसीना। अपने पसीने की गंध भी पता चलती है ऐसे वक्त। सोने नहीं देती।

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  6. भावो से सजी आप की यह रचना बहुत सुंदर लगी

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  7. लगा बस कविता यहीं थी...

    कितनी रातें यूँ ही जागता
    अपनी करवटों को सुलाता रहा हूँ।...

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  8. @ रवि जी,

    मैं चितेरा शब्दों का
    न तूलिका न प्रेरणा
    आँखों के कैनवास
    अनुभूतियों के रंग
    अंगुलियों से फेर दिया करता हूँ।

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