मंगलवार, 12 जनवरी 2010

युगनद्ध - 2

युगनद्ध - 1



सज गई
फिर 
उड़ी आवर्तों में 
सिहरी, लहकी
खुली बहकी
लहर लहर
नाच उठी।

सहलाया
दुलराया
सीने से लगा
बहकाया
दे सहारा घुमाया
आनन्द आवर्तों में।


गूँज उठी किलकारी 
बच्चों की।
युगनद्ध जो हुए थे
पतंग और पवन।

20 टिप्‍पणियां:

  1. आवर्त शब्द ने ध्यान खींचा है बंधु।

    अब तक केमिस्ट्री के केवल आवर्त सारणी से ही परिचय था, नहीं जानता था कविता में इतना सुंदर आवर्त शब्द का प्रयोग हो सकता है।

    बहुत खूब।

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  2. बहुत बढ़िया. याद आ गयीं वह बरेली-बदायूं की गर्मियों दोपहरियाँ. और याद आया पतंग-चोर फीरोज़ का लंगड़.

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  3. जम गई
    फिर
    बढ़ी आवर्तों में
    बरसी, चहकी
    रसभरी फुहार
    भिगो गयी
    मन का पोर-पोर।

    मन भाया
    हरषाया
    दिल से लगाया
    मुस्काया
    बारम्बार डुबाया मन को
    आनन्द आवर्तों में।


    गूँज उठी जयजयकार
    कविता के भक्तों की
    युगनद्ध जो हुए थे
    प्रतिभा और शब्द।

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  4. दो दिन की दूरी पर है देखना आनंद अवर्तों में ..
    संक्रांति पर जयपुर पूरा छत पर होता है और आसमान पतंगों से अटा ...!!

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  5. नचाती, दुलराती, बहकाती सी कविता...
    अरे !! मन पतंग हुआ जाता है...आनंद के आवर्तों में....
    सम्हल जाए तो अच्छा है ..मांझा जो कुछ कम हो गया है....:):)
    क्या लिखते हैं बाप रे.....!!

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  6. धरती और आकाश एक हो गया !
    बच्चे और पतंग ...
    '' गूँज उठी किलकारी
    बच्चों की।
    युगनद्ध जो हुए थे
    पतंग और पवन। ''
    .......... आभार ,,,

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  7. बहुत सुन्दर
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी की टिप्पणी भी खूब
    'आवर्तों में' ...गजब का आनंद भर गया..मन में.

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  8. गिरिजेश जी हम तो डूब गए इस भंवर में .....!!

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  9. मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामना ....!!

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  10. युग नद्ध
    सन्नद्ध
    दो
    तन
    मन
    स्वयंस्फूर्त
    सृजन
    धड़कन
    पल पल
    आत्मविस्मृत
    सा मन
    क्षण क्षण

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  11. ठीक ही है ........लेकिन मुझे नही लगता की इसकी कोई ख़ास जरूरत थी ! भाग १ अपने आप में समग्र है !

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  12. सज गई
    फिर
    उड़ी आवर्तों में
    सिहरी, लहकी
    खुली बहकी
    लहर लहर
    नाच उठी।

    सहलाया
    दुलराया
    सीने से लगा
    बहकाया
    दे सहारा घुमाया
    आनन्द आवर्तों में।


    एज यूजुअल , इसमे आपकी कलाकारी दर्शनीय है ! :)

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  13. @फोटो
    हर कविता में अपनी ही फोटो क्यों लगा देते है ?

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  14. @ आर्जव
    अरे भाई हर कड़ी स्वतंत्र है। युगनद्ध थीम है।

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  15. पिछली कई कविताओं में आई टिप्पणियाँ देख कर सोच रहा हूँ, संक्रामक हैं आप अपनी कविताई के ढंग में ।
    ढंग से टिप्पणी करने वाले भी आपके प्रभाव में बेढंगी (?) टिप्पणियाँ करने लग गए हैं । एक नयी धारा ! अब अरविन्द जी भी !

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  16. युगनद्ध-१,२....श्रॄंखला तो चल सकती है यह !

    सच कहूँ ! सम्मोहन-सा कर दिया है भईया !

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