रविवार, 3 जनवरी 2010

गए बिहाने सजन

लगन की बात न करो रे सजन
लगे है पवन में अगन रे सजन।

कुमकुम उतरी अधर में सजन
संझा की लाली है देखे सजन।

नेवत रही अँखियाँ निहारें सजन
जवानी भी करती है कैसे भजन।

मैं तो हूँ चुप खन चूड़ी खनन
मइया बुलाएँ,क्या बहाने सजन!

सिमट गए बोल आखर अखर
खुल गई बातें, सँभाले सजन।

चुम्बन की बरखा अन्हारे सजन
कागज बिना जो पढ़ाए सजन।

पीर सिमटी कहाँ जो बताएँ सजन
आँसु राँधा बिजन,गए बिहाने सजन।

15 टिप्‍पणियां:

  1. अब अन्हारें में टेरे हो कैसे भजन।
    जान पायेंगे भीतर की बतिया न जन॥

    करवटें ली बदल, कर लीं चिन्तन मनन।
    पीर मद्धिम न होती, न होती सहन॥

    है ये कैसी जगन,मन कहाँ है मगन?।
    मन में लागी लगन, तन में लागी अगन॥

    कर ले प्यारे भजन, बस भजन, बस भजन!!!

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  2. अंतिम की टीस साल गयी ! कविता हमें भी अच्छी लगी ! क्यों? बाद में !

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  3. ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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  4. म्हारे लिए तो बसंत का आह्वान है यह -इस मुई ठंडक में बसंत सेना की इसी रणभेरी की जरूरत थी ...
    बजी दुंदभी .खत्म हुयी यह निगोड़ी शीत निष्क्रियता !
    स्वागतम -कितना बढियां लग रही है ,जनवरी भर रोज यह दुन्दुभी सुनने यहाँ आऊंगा

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  5. सुन्दर भावमय प्रस्तुति है...!!

    कृपया अन्यथा विचार न कीजियेगा एक दो पद में थोडा शिल्प/लय कमजोर दिखता है
    जैसे... नेवत रही अँखियाँ निहारें सजन
    जवानी भी करती है कैसे भजन।

    रचना प्रभाव छोडती है.. खूब पसंद आई

    नववर्ष की बधाई और शुभकामनाओं सहित

    - सुलभ

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  6. मगन मगन भये सजन
    बस एन्ने से उन्ने गमन
    सुर तो लगावत हैं
    काहे भूलाये भजन सजन
    खुलासा तो होय रही
    सब जानिहैं बोली बचन
    अन्हरिया में काहे करी
    वोही चिजवा की तूने गबन....

    हमेशा की तरह...लाजवाब ...!!

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  7. @सुलभ सतरंगी
    अन्यथा विचार कैसा प्रभो! लोग खरी खरी कहॆं तो खरी बात बने।
    इसमें ग़ज़ल या गीत या छन्द के लय शिल्प को ढूढ़ेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। मैंने तो इसे होली कबीरा, सावन कजरी या 'हुरका' के समय दो समूहों के मध्य ढोलक के सहारे होने वाले लयात्मक संवाद की तर्ज पर रचा था। और पढ़ कर परखा भी था।

    आते रहें। अच्छा लगता है।

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  8. मासूम अभिव्यक्ति सजनी की...

    सिमट गए बोल आखर अखर
    खुल गई बातें, सँभाले सजन।....

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  9. सिमट गए बोल आखर अखर
    खुल गई बातें, सँभाले सजन।....
    क्या जबरदस्त फीलिंग है भाई........... बेहतरीन.....

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  10. बड़े अच्छे सुनार हैं आप !
    धन्य गढ़ान !!
    हर एक कटान पर आभा की खान !!!

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