बुधवार, 16 जून 2010

लाली

लाली !
पहली बार भोर में मिले थे हम
कई दिनों के इशारे के बाद।
मैंने कहा था
" तुम्हें ध्रुवतारा दिखा दूँ?
अटल रहता है। "
" यही दिखाने  को
बुलाए इस समय ?"
कुछ कह पाता कि
तुम सिमट आई थी 
"मुझे दिखाओ" ।
सप्तर्षि के सहारे
ध्रुवतारा देखने  के बहाने
तुम लिपट ही गई थी !
और
मेरी साँसे रुक गई थीं
वह मृत्यु का पहला अनुभव था । 
यकीं हुआ कि मेरा यह पहला जन्म -
यकीं हुआ कि मैं प्रेम अभिशप्त
स्वर्ग से धरती की ओर दण्डित ।
"ऐसा शमाँ !
तुम्हें साँप क्यों सूँघ गया ?
बड़े कायर हो ! "
मुझे दर्शन हुआ
अपने पहले दोष का ।

    
छुट्टी के दिन
खड़ी दुपहरी ।
चूड़ी पहनाने वाली
की ओट ले
तुम्हें घूरता मैं -
प्रसन्नता थी छलक रही 
खेल रहे थे होठ और गाल
लुकाछिपी
हँसी के बहाने -
और तुमने बहन से कहा था
देखो फालतू दाँत निपोर रहा है,
मउगा !
मैं चुल्लू भर पानी में
डूब मरा था।


याद आती है वह शाम
प्रगल्भ हो मैंने
कहा था तुमसे -
बहुत मीठी हो
तुम्हारी आँखों ने
उत्तर दिया -
छिछोरे हो
होठ तुम्हारे हिले तक नहीं।
उस नीम के नीचे
कड़वाहट की बयार बह चली थी।


वह गहरी रात !
संगीत के सुर
लिहाफ माँग रहे थे। 
शादी की थकी खुशियाँ
कर रहीं थीं सोने के जतन -
तुमने हाथ पकड़ा था
आज भी याद है
जाड़े की वह गर्मी !
मैं खड़ा स्तब्ध
तुम्हारी साँसें लेने लगीं
टोह मेरी साँसों की
और अनजाने ही
बहक उठे थे मेरे हाथ  
"छि: बड़े बेशरम हो !"
तुम भाग खड़ी हो गई
माँ के पास । 
तुमने बनाया मुझे
पहली बार
गुनाही ।


सुबह होते होते
मुझे जाड़े में लू लग गई।
सात दिनों तक ज्वरग्रस्त
ज्वर के साथ तुम भी उतर गई।


नहीं !
तुम वह सान नहीं थी
जिस पर मैं धारदार होता ।
तुमने किया मुझे हमेशा
लुहलुहान
कभी अपने होठ रँगने को
कभी  मुझे परखने को
एक एक बूँद
करती गई मुझे
शनै: शनै: प्रमाणित
और तुम ?
बस लाल होती गई ।


आज याद आई हो तो बस
दिख रही हो
कुछ निर्जीव रेखाओं सी ।
तुम्हारे इर्द गिर्द चार चार बच्चे!
लाली गई तेल लेने ।
आइने में खुद को देखता हूँ -
आत्ममुग्ध नहीं,  आलोचक की तरह।
केश कुछ उड़ से चले हैं
मूछें कहीं कहीं चाँदी ।
लेकिन -
भोला बच्चा
शर्मीला किशोर
नादान जवान
सब
अभी भी वैसे ही हैं ।
आँखों में है सम्मोहन
मेरी मुस्कान में आज भी है -
लाली। 
...
और मैंने अपनी पत्नी को
दिन ब दिन
वर्ष दर वर्ष
लाल होते देखा है ।


ये क्या ?
ड्रेसिंग टेबल पर
लुढ़क गई  नेल पॉलिश की शीशी
शब्द सा बन रहा है -
लाल लाल ।
पढ़ता हूँ
नहीं वह 'हिंसा' नहीं है
बस है लाल लाल।
... लाली।

14 टिप्‍पणियां:

  1. कित्ता सुन्दर लिखा है भाई। वाह वाह, लाजवाब हो गये इस पोस्ट को पढकर

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  2. शब्द शब्द नि:शब्द कर गये. इतना करीबी वाह
    सुबह होते होते
    मुझे जाड़े में लू लग गई।
    लू का भला मौसम से क्या सम्बन्ध
    बेमिसाल

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  3. कुछ रुके हुए लम्हे जिन्दगी के साथ चलते हैं ...हमेशा ,,,!!
    कही की लाली कही उतर आती है ...
    बहुत अच्छी लगी कविता...!!

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  4. खूब रचे हो महाराज ...पल पल भोग यथार्थ कह दिए हो....
    अज्ञेय का क्षणवाद समझ में पूरी तरह से आया है आज
    वह अभिसार()स्थल ) धन्य हुआ जहां यह सब प्रादुर्भूत हुआ !
    कभी वह थल और वह जीवंत स्रोत तो दिखायें ...
    बहुत इच्छा हो रही है !

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  5. ...
    क्या रिश्ता है समझ न पाया
    आज पराया कल अपना था

    हुई उषा तो टूटा पल में
    भोर का मीठा सा सपना था!

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  6. 'नहीं वह 'हिंसा' नहीं है
    बस है लाल लाल।
    ... लाली।''
    क्या यह विडंबना नही हैं ...... कि वह बस लाल ही है .....हिंसा नहीं ........काश हिंसा होता ......तो थोड़ा चैन होता ! ..........ऐसे तो वह लाली ही कितनी हिंसक है !!!!!!!!!!!!!!

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  7. मुझे जाड़े में लू लग गई। great !!!!!!!!!!!!

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  8. अच्छा लगता है यह देख कर कि ये अनुभूतियां लाइफ की सेकेण्ड इनिंग में भी इस तरह दखल रखती है . पता चलता है कि आज जो हम महसूस रहे हैं वह सब रहेगा किसी न किसी तरह और लोगो का यह कहना कुछ हद तक गलत है कि उम्र के साथ बहुत कुछ बदल जाता है . एक दृष्टी से यह थोडा संतोष देता है .............कि सब कुछ नही मिटेगा .....समय मिटा नही पायेगा .....उन लोगो को.......हमारे भीतर से .....किसी न किसी तरह से .......वे रहेगे ही ........किसी न किसी रूप में ..........निर्जीव रेखाएं.........लाली .....या शब्द बनकर.......पास हमारे !

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  9. कायर, छिछोरा, मउग, गुनाही, बेशरम... से भोला बच्चा, शर्मीला किशोर, नादान जवान... वाह जी वाह !

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