रविवार, 6 जून 2010

लघु गीत

बादर साज नयन रहे कोरे 
उड़ रही धूर मलय संग भोरे

उमस की कोठ सजन लिए ओट 
पेम के नेम तजत रहे सो रे
उड़ रही धूर मलय संग भोरे । 

ऋतु बदल रही ऋतु अखर गई
सेज दुखी नहिं ताँतन तोरे** 
बादर साज नयन रहे कोरे। 
 
** प्रणय केलि के समय खाट के तंतुओं की चरमराहट  

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया! बहुत बहुत बढ़िया! गुनगुना रहा हूँ!

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  2. लगता है बारिश वहाँ लखनऊ में भी पहुँच गई है....तभी भीगे भीगे गीत कुछ अकुलाहट लिए बरस रहे हैं :)

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  3. अब हम शायद बात नहीं समझ रहे हैं ....फिर भी खुलासा करना चाहते हैं जी...
    बादर साज नयन रहे कोरे .....बादल हैं फिर भी नयन कोरे हैं, अर्थात खाली हैं
    उड़ रही धूर मलय संग भोरे ....अर्थात अलसुबह की हवा में भी धूल उड़ रही है.....
    अब इसमें सावन , या वर्षा की बात तो हम नहीं देख रहे हैं....अब हो सकता है की कोई कोई चालीस पर दू पार कर जाता है तो सठिया जाता है ....जो आज कल हमरी हालत है....तो कह नहीं सकते हैं...बाकि हमको यही बुझाया है...
    कवित सुन्दर है....बल्कि कहें तो बहुत सुन्दर है.....
    आभार....

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  4. @ अदा जी,
    आप एकदम सही समझ रही हैं।
    बदरी, उमस, घुटती कोठरी, प्रिय का रूठना, भीतर बाहर दोनों ओर वर्षा के लिए उपयुक्त स्थिति लेकिन बाहर भोर की सुगन्धित हवा के साथ धूल है तो भीतर मिलन की साक्षी सेज उदास है। ...
    साजन को जिन परिस्थितियों में प्रेम की वर्षा कर देनी चाहिए, उन्हीं परिस्थितियों की आड़ ले मुँह फुलाए सोया हुआ है।

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  5. बस यही समझ आया की गीत सुन्दर है ...:):)

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  6. प्रशंसनीय ।
    शास्त्रीय । एक बन्द और होता ।

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  7. पहले थोड़ा-थोड़ा समझ में आया था. टिप्पणी के बाद पूरा समझ में आ गया... इतना अच्छा लिखते हैं आपलोग मैं तो स्तब्ध रह जाती हूँ बस.

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  8. सुंदर ... अति मधुर गीत ... और समझ भी आ गया अब तो ...

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  9. अरुणेश मिश्र जी, आपकी फरमाइश हम पूरी किए देते हैं।
    ये लीजिए एक और बन्द-

    मन मचलत गहन अनल बन तन
    बरबस करवट, न बदल, कर जोरे
    बादर साज नयन रहे कोरे।

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  10. निश्चय ही गीत थोड़ा और बड़ा होना था ..
    सुन्दर !

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