बुधवार, 9 जून 2010

आओ प्रिये !

अब जब कि मैं लिखना चाहता हूँ
ढेर सारा
अनुभूतियाँ हैं ढेर सारी
और शब्द स्रोत सूख गए हैं  -
तुम्हारी प्रतीक्षा है।

तुम जो बैठी रहती थी
ठीक पीछे स्क्रीन को ताकती
झूलते रहते थे तुम्हारे अलक
की बोर्ड पर
और कानों को घेरती वह साँसे !
साँसों और शब्दों की केमिस्ट्री
अभिव्यक्ति के कितने समीकरण
सजा जाती थी !
शब्दों के खुलते थे नए अर्थ
सहारा लिए तुम्हारी देह के
बदलते दबावों के साथ ।

कितनी ही बार
जब टपके आँसू
की बोर्ड पर !
न सोचा कभी
तुम्हारे या मेरे ?
मैं चकित हुआ
गंगा यमुना के संगम पर
और सरस्वती बहती रही ।

एक त्रासदी
जारी रही
मैं कागज पर नहीं लिख पाता
मस्तिष्क के जाने किस कोने
कुछ अघटित हुआ कभी
अंगुलियों से निकसे शब्द
हो गए मुड़े तुड़े अक्षर
(उनका ब्रह्मत्व लुप्त )
मात्राएँ सवार व्यञ्जनों पर
कुरूपता के प्रतिमान स्थापित करते -
मुझे याद नहीं रहा
आखिरी बार कब सुन्दर लिखा था !

याद रहता भी क्यों ?
आवश्यकता भी क्या थी ?
तुम थी
की बोर्ड पर झूलते अलक
कानों के पास टहलती साँसें
देह का देह पर टहलता दबाव
टपकते आँसू
तो कभी मुस्कान से
बदलती साँसों की लय -
हाँ, मैं था -
देहधर्मी कवि ।
जो कुछ रचता था
उनमें न थे :
उदात्तता
आलोचक प्रिय सौन्दर्य
गरिमा
क्रोध
प्रेम
घृणा ...
बस तुम थी
तुम्हारी गढ़न
व्यवस्थित अक्षर अक्षर
मेरी हर अभिव्यक्ति
ढल जाती थी
अद्भुत शिल्पकारी में !
लोग कहते थे
क्या खूब रचता है !

आज तुम नहीं हो
साँस, आँसू, दबाव, मुस्कान ...
सब विलुप्त
खो गई है ऊष्मा
किस गर्भ से
कैसे कोई अंकुर फूटे ?
धरती नहीं होती बन्ध्या कभी
यह ज्ञान हुआ है कि
ऊष्मा न हो तो कुछ नहीं ।
ढेर सारा यूँ होता है
कुछ नहीं
कुछ भी नहीं -

आओ ! फिर से आओ!!
की बोर्ड की टक टक को
जीवन दो
स्वर दो
ऊष्मा दो
आँसू दो
स्मित दो
घेर लो एक बार फिर
ऊष्ण साँसों की गन्ध से !
मैं रचना चाहता हूँ।
थकान से मुक्त होना चाहता हूँ।
आओ प्रिये !

19 टिप्‍पणियां:

  1. ये कवि किस मृग मरीचिका में पड़ा श्लथ हो गया है ?
    दूसरा रास्ता नापो भाई कब तक राह तकोगे ?
    ये छायायें ,छलनाएँ कब किसी की हुयी है भला ?
    आओ हम गलबहियां मिल रोयें !

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  2. क्या कहूँ या क्या न कहूँ ?
    आयी और हृदय में जा समा गयी आपके भावों की मधुरिम अभिव्यक्ति ।
    सम्मुख थी तुम, भावों को आयाम, दिशा मिल जाती थी,
    शब्द आज भी राह तक रहे, तेरे मुग्ध प्रवाहों की ।

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  3. आपकी यह कविता बहुत पसंद आई है...धन्यवाद..

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  4. अब ये की-बोर्ड जीवन दायिनी, माउस प्राण प्रवाहिनी और मोनिटर मति सुधारिणी....जो भी हैं ..आपके सन्मुख आ जाएँ यही प्रार्थना है...
    कविता तो अच्छी है...और इसमें कौनो शक भी नहीं है....

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  5. ये आह्वान बिलकुल नए ढंग का निराला लगा...खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  6. (क्षमा याचना के साथ) अरविन्द जी की बात पर याद आया - माया महा ठगिनी हम जानी
    कविता पसंद आई!

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  7. कौन थी वह ....!!
    न न ...कौन है ..?
    ऊष्मा के बिना इतना सुन्दर गीत रच गया तो उसे वही रहने दे जहाँ है ...

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  8. नये वक्त के कवि...!
    छटपटाहट का व्याकरण भी अजब-गजब है..दिखता आपकी कविताई में बहुत ही है !
    देहधर्मी कवि ? ऐसा ही होता है ? आप-सा ही होता है?

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  9. ’तुम थीं..’”
    ’बस तुम थीं..’
    यह सम्मोहन क्षणिक है ?
    ’तुम थीं’ की एक कहन में जीवन बीतने भर की सामर्थ्य नहीं ? ’तुम्हारी एक गढ़न’ आँखों में ठहर नहीं गयी .. जीवन भर के लिए !

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  10. "जो कुछ रचता था
    उनमें न थे :
    उदात्तता
    आलोचक प्रिय सौन्दर्य
    गरिमा
    क्रोध
    प्रेम
    घृणा ..."

    इन पंक्तियों में मन उलझ रहा है ! यह क्यों ? जरूरत ही नहीं इनकी ! अर्थ ही नहीं इनका !
    क्योंकि ’तुम थीं’
    तो सब कुछ था ! यह ’तुम’ किसमें उपस्थित नहीं ? या इस ’तुम’ में उपर्युक्त क्या नहीं ?

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  11. बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना!
    --
    आपसे परिचय करवाने के लिए संगीता स्वरूप जी का आभार!
    --
    आँखों में उदासी क्यों है?
    हम भी उड़ते
    हँसी का टुकड़ा पाने को!

    उत्तर देंहटाएं
  12. .
    .
    .
    "आओ ! फिर से आओ!!
    की बोर्ड की टक टक को
    जीवन दो
    स्वर दो
    ऊष्मा दो
    आँसू दो
    स्मित दो
    घेर लो एक बार फिर
    ऊष्ण साँसों की गन्ध से !
    मैं रचना चाहता हूँ।
    थकान से मुक्त होना चाहता हूँ।
    आओ प्रिये !"


    @ अपरिचित-अनाम,

    इतनी शिद्दत से बुला रहा है कवि... अब चली भी जाइये कवि के पास... :)

    @ आदरणीय गिरिजेश जी,

    बिना 'उस' के यह गजब ढा रहे हैं देव, अब जब वोह आ जायेगी तो क्या होगा... हम तो यही सोच-सोच हैरान हैं... समेट लो भाई सब अपना बोरिया-बिस्तरा-दुकान-ब्लॉग आदि इत्यादि... अब 'वोह' आने ही वाली हैं!... :)

    आभार!

    ...

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