शुक्रवार, 25 जून 2010

फुटकर

यकीं कैसे करूँ होठों पर 
अटकी हैं आँखें आँखों पर।


फूटते हैं अरमाँ-ए-इश्क 
ब्याह में छूटते पटाखों पर।


उकूबत में हर्फ तड़पते रहे 
रख दिए खत जो ताखों पर। 


चटकते चटकारे तन्दूर घेरे 
कोई मासूम है सलाखों पर। 


चमन में क़ायम कोयल कूक
कौवों के घोसले शाखों पर। 

8 टिप्‍पणियां:

  1. मासूम सलाखों पर ...!

    चमन में क़ायम कोयल कूक
    कौवों के घोसले शाखों पर....

    कौवे बोल रहे बोली कोयल की ...
    विरोधाभास है आँखों और होठों की बातों में कहीं ...!

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  2. .
    .
    .
    क्या है यह देव ?
    थोड़ा समझायिये भी !

    आभार!


    ...

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  3. उकूबत में हर्फ तड़पते रहे
    रख दिए खत जो ताखों पर।

    खूबसूरती से कही ग़ज़ल ..आभार

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  4. मजमा-ए-ब्लॉगरी लगेगा फिर।
    मजम्मतें होगी भली लाखों पर॥

    :)

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  5. भले ही चाशनी घुली बोली है इन कोयलों की
    मगर पैदाईश है इनकी कौओं के घोसलों की ...

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  6. इसके काफ़िये मे तो मज़ा आ गया .. क्या रवानी है ..

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