रविवार, 15 नवंबर 2009

नरक के रस्ते - 3


निवेदन और नरक के रस्ते -1  
नरक के रस्ते -2  से जारी.. 


मुझे बेचैन करता है
क़स्बे की सुबह का ऐसे सिमट जाना!
लगता है कि एक नरक में जी रहा हूँ
शायद ठीक से कह भी नहीं पाना
एक नारकीय उपलब्धि है।

कमरे में बदबू है
मछली मार्केट सी।
जिन्दा मछलियाँ जिबह होती हुईं
पहँसुल की धार इत्ती तेज !
जंगी के शरीर में जाने कितनी मछलियाँ
ताजी ऊर्जावान हरदम उछलती हुईं
शीतल आग में धीरे धीरे
फ्राई हो रही हैं
कौन खा रहा है उन्हें ?

कौन है??  
चिल्लाता हूँ

भागती अम्माँ आती है
आटा सने हाथ लिए
पीछे बीवी ।
... चादर के नीचे शरीर में दाने निकल आए हैं ।    
सुति रह !
कैसे सो जाऊँ ?
ये जो शराब पी कर वह जंगी जी रहा है
जिन्दगी की जंग बिना जाने बिना लड़े
अलमस्त हो हार रहा है।
वह रिक्शे की खड़खड़ जो हो जाएगी खामोश
बस चार पाँच सालों में टायरों को जला जाएगी आग
रह जाएगा झोंपड़ी में टीबी से खाँसता अस्थि पंजर
मैं देख रहा हूँ – कुम्भीपाक में खुद को तल रहा हूँ।
अम्माँ तुम कहती हो – सुति रह !!

मेरे इतिहास बोध में कंफ्यूजन है !
मैं मानता हूँ कि इस मुहल्ले में रहते
ये पढ़े लिखे मास्टर – कोई डबल एम ए कोई विशारद
दुश्मन के सामने तमाशा देखती गारद ।
निर्लिप्त लेकिन अपनी दुनिया में घनघोर लिप्त
करें भी तो क्या परिवार और स्कूल
इन दो को साधना
करनी एक साधना कि
बेटे बेटियों को न बनना पड़े मास्टर।
कोई इतिहासकार न इनका इतिहास लिखेगा
और न जंगी की जंग का
सही मानो तो वह जंग है ही नहीं ...
इसका न होना एक नारकीय सच है
समय के सिर पर बाल नहीं
सनातन घटोत्कच है।

गुड्डू जो किलो के भाव बस्ता उठाता है
दौड़ते भागते हँसते पैदल स्कूल जाता है
कॉलेज और फिर रोजगार दफ्तर भी जाएगा
उस समय उसे जोड़ों का दर्द सताएगा
जब कुछ नहीं पाएगा
समानांतर ही धँस जाएंगी आँखें
दीवारों पर स्वप्नदोष की दवाएँ बाँचते
बाप को कोसेगा जुल्फी झारते और खाँसते ।
बाप एक बार फिर जोर लगाएगा
बूढ़े बैल में जान बँची होगी ?
भेज देगा तैयारी करने को – इलाहाबाद
सीधा आइ ए एस बनो बेटा – मुझे मत कोसना ..

मैं अकेला बदबूदार कमरे में
मांस जलने की बू सूँघते
बेशर्म हो हँसते
मन में जोड़ता हूँ ये तुकबन्दी
भविष्य देख रहा हूँ – सोच संकट है।
अर्ज किया है:
”खेतों के उस पार खड़ा
रहता हरदम अड़ा अड़ा
सब कहते हैं ठूँठ ।

बढ़ कर के आकाश चूम लूँ
धरती का भंडार लूट लूँ
कितनी भी हरियाली आई
कोंपल धानी फूट न पाई
चक्कर के घनचक्कर में
रह गया केवल झूठ
सब कहते हैं ठूँठ।

हार्मोन के इंजेक्शन से
बन जाएगी पालक शाल
इलहाबाद के टेसन  से
फास्ट बनेगी गाड़ी माल
आकाश कहाँ आए हाथों में
छोटी सी है मूठ
सब कहते हैं ठूँठ ।

गुलाब कहाँ फूले पेड़ों पर
दूब सदा उगती मेड़ों पर
ताँगे के ये मरियल घोड़े
खाते रहते हरदम कोड़े
पड़ी रेस में लूट (?)
सब कहते हैं ठूँठ”

ये जवानी की बरबादी
ये जिन्दगी के सबसे अनमोल दिनों का
यूँ जाया होना
मुझे नहीं सुहाता।
..कमाल है इस बारे में कोई नहीं बताता।

इस बेतुके दुनियावी नरक में
तुकबन्दी करना डेंजर काम है। (जारी)    

12 टिप्‍पणियां:

  1. कमरे में बदबू है
    मछली मार्केट सी।
    जिन्दा मछलियाँ जिबह होती हुईं
    पहँसुल की धार इत्ती तेज !
    जंगी के शरीर में जाने कितनी मछलियाँ
    ताजी ऊर्जावान हरदम उछलती हुईं
    शीतल आग में धीरे धीरे
    फ्राई हो रही हैं
    कौन खा रहा है उन्हें ....

    jee bahut achchi lagi yeh rachna..... abhi teenon part padhe ..... ab aage ka intezaar hai....

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  2. ओह...ये सतत..उम्दा...आख्यान...और "और अधिक"..जारी है....बुखार बधाई हो....

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  3. गुड्डू वाली लाइनें तो गजब की हैं... आज की कड़ी में नरक के रास्ते के करीब से दर्शन हुए. बाकी कड़ियों से ज्यादा वास्तविक लगी ये कड़ी.

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  4. मित्रवर !
    आपकी ब्लॉग जगत पर उपस्थिति
    सार्थक और संतोषप्रद है |
    मानीखेज कविताओं का नितांत अभाव
    है , और आप इस अभाव की पूर्ति कर रहे हैं |
    ऐसा इसलिए है क्योंकि आप महसूसते हैं कि---
    '' ये जवानी की बरबादी
    ये जिन्दगी के सबसे अनमोल दिनों का
    यूँ जाया होना
    मुझे नहीं सुहाता।
    ..कमाल है इस बारे में कोई नहीं बताता।''
    प्यारी लगीं ये पंक्तियाँ |
    हार्दिक आभार ... ...

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  5. क्या इसे की कलाइडॊस्कोप कहते हैं? आपने तो रामकोला की भूषण कालोनी का वृत्तचित्र खड़ा कर दिया।

    मेरा वहाँ जाना बहुत कम हुआ है लेकिन साढ़े नौ का भोंपू तो हम भी सुनते आये थे। रामकोला की पुरानी बाजार में लछमन सेठ के मकान में किरायेदार जो थे।

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  6. satat pravaah hai rachna ka ... chalchitr ki tarah jeevan ki rantrana ko ujaagar karta huva ... dastavez hai yeh keval rachna nahi ...

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  7. गुलाब कहाँ फूले पेड़ों पर
    दूब सदा उगती मेड़ों पर
    ताँगे के ये मरियल घोड़े
    खाते रहते हरदम कोड़े

    बहुत ही बेहतरीन पंक्तियों से सजी उत्‍तम रचना ।

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  8. समय के सिर पर बाल तो नहीं होते , आपने आईना दिखाने की पुरजोर कोशिश की है , हमारी शुभकामनाएं हैं |

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  9. भैया!

    जंगी रिक्शा खींचते-खींचते
    अपने नालायक औलादों और-
    अपने कुसंस्कारों
    की बलि चढ गया.......

    शायद आपको भी दु:ख हो--
    लेकिन
    सच
    बस यही है-
    पनहेरिन की सुर्ख आँखों की नमी थक चुकी है.......

    सादर

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  10. अरे यहां तो गज़ब गुजर रहा है...

    थोड़े ही दिन गुजरे नहीं आए, और यहां तो आलसी भाई धड़ाधड़ छापे चले जा रहे हैं...
    शायद बुखार का असर है...
    एकान्तिक प्रलाप जारी है...

    शायद यही कुंभीपाक है...शायद यही आम नियति है...
    यह क्यों हैं?...आखिर ऐसे हालात...

    सोचना इसे भी...इसके लिए भी हमीं अभिशप्त हैं...

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  11. इस बेतुके दुनियावी नरक में
    तुकबन्दी करना डेंजर काम है।

    अभी तो ये डेंजर काम जारी है ......!!

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  12. '' ये जवानी की बरबादी
    ये जिन्दगी के सबसे अनमोल दिनों का
    यूँ जाया होना
    मुझे नहीं सुहाता।
    ..कमाल है इस बारे में कोई नहीं बताता।''
    प्यारी लगीं ये पंक्तियाँ |
    हार्दिक आभार ... ...
    ज़िन्दगी को कितने करीब से देखते हैं और उन संवेदनाओं को शब्द देना शायद आप जैसा संवेदन्शील व्यक्ति कर सकता है बहुत अद्भुत रचना है बधाई

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