गुरुवार, 5 नवंबर 2009

अरमान

हमने जो पूछा उनका हाल 
देखा किए वे कहर का सामान
गुम थे सुम थे
लौट आए हम।
..फिर सुलगते रह गए अरमान।


15 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना गिरिजेश भाई .......
    आपको जन्मदिन की ढेर सारी बधाई एक बार फिर

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  2. गिरिजेश जी मेरे ब्लॉग पर आने और सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आभार
    आपने चंद लाइनों जो कुछ कह दिया है अद्वितीय है
    आभार रचना दीक्षित

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  3. क्या बात है बहुत खूब कहा है...बधाई...
    नीरज

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  4. आखिर ये अरमान कब तक सुलगते रहेंगे इन्हे तो दावानल बनना था

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  5. सही है जब अरमान सुलगते है तो धुआ भी नही उठता.........बस दिल की लगी होती है ........पर कबतक? मुझे नही पता!

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  6. फिर जाना था... काहे को अरमान सुलगाते रहे :)

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  7. गुम के साथ साथ सुम होना भी अच्छा लगा ! …………………………….और अरमान तो सुलगते ही रह जाय तो ही अच्छा है !

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  8. आपकी छोटंकी कवितायें गजब होती हैं । यह भी वैसी ही है ।

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  9. गज़ब की है छोटी सी छनिका .... गुम थे ... सुम थे .... बहुत अच्छा लगा .....

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  10. गुम के साथ ....साथ सुम होना?ऐसा लिखना -अनूठा ख्याल लगा !
    अरमानो में आंच न हो तो कविता लिखी कैसे जायेगी?
    जो हुआ अच्छा हुआ.

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  11. गुम थे सुम थे
    लौट आए हम।
    ..फिर सुलगते रह गए अरमान।
    क्या बात है!

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  12. हमने जो पूछा उनका हाल
    देखा किए वे कहर का सामान
    गुम थे सुम थे
    लौट आए हम।
    ..फिर सुलगते रह गए अरमान।

    वाह.....दो पंक्तियों में कमाल .....!!

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