गुरुवार, 26 नवंबर 2009

तन धन ...अकिञ्चन


यौवन
तन धन
सजे
सन सन।


शोर शोख 
बरजोर बार,
बार लेकिन 
कानों में कन कन 
तन धन
बजे घन घन।


आँख डोर 
बहकन
मन पतंग
तड़पन।
उठन शहर भर 
नीक लगत 
हवा पर
विचरण 
लहकन
तन धन 
बिखर छम थम।


लुनाई -
साँवरा बदन
कपोल लाल 
अधपके जामुन 
रस टपकन 
अधर मधुर 
मधु भर भर
कान लोर
लाल 
शरम रम रम 
तन धन
सिमट 
कहर बन शबनम।  


देह 
द्वै कुम्भ काम
दृग विचरें 
सप्तधाम 
कटि कुलीन 
नितम्ब पीन 
उतरे क्षीण
जैसे  
पश्चात मिलन 
पतली पीर 
सिमटन
तन धन 
...
...
धत्त अकिंचन !

20 टिप्‍पणियां:

  1. धत्त अकिंचन...
    इस आखिरी कील के बिना यह ताबूत पूरा नहीं हो पाता...

    शब्दों की मितव्ययता में आपका जवाब नहीं...

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  2. शोर शोख
    बरजोर बार,
    बार लेकिन
    कानों में कन कन
    तन धन
    बजे घन घन।

    बहुत सुंदर प्रवाहमयी कविता....दिल को छू गई और बहुत अच्छी लगी...

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  3. वाह, वाह! शब्दों के कृपण-प्रयोग से भी क्या जीवन्त कविता बनती है! बहुत सुन्दर।

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  4. मै इस बात को महसूस कर रहा हूँ कि हिन्दी मे यह एक नये शिल्प का उद्भव हो रहा है .. मै आपकी कविता को स्वर में पढ़ता हूँ और इसके पाठ से उत्पन्न ध्वनि से मुझे बहुत आनंद आता है ।

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  5. कविता वही है जिस में शब्द न्यनतम हों। लाजवाब शिल्प!
    अंतिम पंक्ति ने तो कविता को भी लाजवाब बना दिया।

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  6. यह टिप्पणी बड़के भैया से चैट के दौरान उनके निर्देश पर क्यों कि उनके सिस्टम से किसी कारण वश टिप्पणी नहीं हो पा रही है।
    ______________________________________________
    एक एक शब्द जानलेवा हैं -कौन सी थाती लेकर लौटे हैं ! किस श्यामा नायिका ने मन मोहा और कहाँ ? मेरा भाई बिचारा गया काम से !
    सुन्दर नव प्रतीक विधान और कविता की ध्वन्यात्मकता भी -क्या कहने!और वह पीर रेख अवशेष !इतनी गहन संवेदना !ओह सारी फार यू डीयर !

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  7. थोड़ा गहरा अनुभव
    और
    पुरजोर साहस
    तीव्र सच्ची दृष्टि
    और
    शांत प्रखर
    अनुराग
    होना चाहिए....शायद ऐसी रचना के लिए....राव साहब..!!!

    आप विरले में से हो...सच्ची...!!!

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  8. शब्‍दो सुंदर चिनाई !

    धत्‍त अकिंचन ?

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  9. गजबे रस्साकशी किया है आपने ...
    दिमाग-भरता-बनाऊ कविता ...

    हम तो मोट बुद्धि - मनाई ...
    का समझब ...

    आभार ... ...

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  10. जैसा शरद जी ने कहा - एक नये कविता-शिल्प का उदय !
    इस भूख-अभाव की कविता के वक्त ऐसा सौन्दर्य-अनुभूति-भाव कैसे सँजोया । लाजवाब !

    शब्दों के प्रयोग की अपरिमित सामर्थ्य है भईया आपमें । हिन्दी से इतर शब्दावली तो और भी विचित्र होकर सज गयी है इस रचना में ।

    निवृत्ति - प्रवृत्ति दोनों साध लिया है न भईया - प्रोफाइल मे बुद्ध, और कविता ....। गजब का विधान ।

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  11. तड़पन
    कहना अधिकाधिक
    शब्द-गुंथन
    न खुल रहा,

    हर टिप्पणी सँजो
    बुन-बुन
    अभिव्यक्तन
    लिख डालूँ सौ-सौ
    .......

    चिन्तन
    कवि अदभुत
    कविता भी
    मन उन्मन
    है क्यों ना
    भईया-सा मन
    ....
    ....
    धत्त अकिंचन !

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  12. ाअद्भुत् शब्द शिल्प मगर मैं निशब्द हो गयी बहुत बहुत बधाई

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  13. एक थे किलरू साव. महा कृपण. चाहतेे थे कि एक चम्मच शुद्ध घी से पूरे परिवार को पकवान का मजा आए. वैसे ही आपके एक-शब्द में तो पूरा महाकाव्य छिपा है. आपके पीपे से तेल की जगह शुद्ध घी टपक रहा है. इसी को कहते हैं वाह रे किस्मत का खेल, पढ़ें फारसी बेचैं तेल.

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  14. देह
    द्वै कुम्भ काम
    दृग विचरें
    सप्तधाम
    कटि कुलीन
    नितम्ब पीन
    उतरे क्षीण
    जैसे
    पश्चात मिलन
    पतली पीर ...

    ADHBUDH SHABD
    UTTAM SANYOJAN ..
    RACHNA NIKHAR
    NIKHAR AAYOJAN ...

    KAMAAL KA SHIP HAI .. IS ADHBUSH RACHNA KA .. SWAAD AA GAYA ...

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  15. अरे बाप रे!
    .
    .
    .
    क्या टिप्पणी करूँ?

    यह पढ़कर लगा जैसे जाकिर हुसेन तबले पर आपकी कविता के पाठ से संगत कर रहे हैं और हम एक-एक सुर, ताल और लय को पकड़ने-समझने की असफल कोशिश कर रहे हैं। बस ‘धन्‌... धन्‌...’ की आवाज अभी तक कानों में गूँज रही है।

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  16. "लुनाई -
    साँवरा बदन
    कपोल लाल
    अधपके जामुन
    रस टपकन
    अधर मधुर
    मधु भर भर
    कान लोर
    लाल
    शरम रम रम
    तन धन
    सिमट
    कहर बन शबनम। "

    अधपके जामुन सम्मुख साकार हो गये !
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    शब्दों में संगीत है ! इसके लिये आपको “घनानन्द” कहूंगा ! डरियेगा मत,:) :) अच्छे कवि हैं ! संगीतात्मकता के लिये ही फ़ेमस हैं !
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    अनुभूति की जो भी डोमेन आप टच करते हैं उसे उसकी हाईरार्की के अन्तिम लेवेल तक धांग आते हैं !
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    “नीक लगत” नीक लगल ! टॆक्निकली एके “कोड स्विचिंग’ कहल जाला ! रऊआ त एम्मे माहिर बाणं ! खाली जवन बोलिया क सब्दवा यूज भयल हऊंवय ओके “कोड मिक्सिंग” कहल जाला ! एसे भासा क सम्परेशीणता बढ़ जाले , जईसन की आप देखते हऊंअ , कई लोग पढ पढ के उप्पर किलकारी मरले हऊंअय !

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  17. ये तो कारखाना है... जैसे वाद्यवृन्द

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  18. गिरिजेश जी
    आपने नायिका के रूप सौंदर्य का जिस बारीकी से वर्णन किया उससे बिहारी की नायिका याद आई .रूप और अदाओं से लबालब भरी सुंदर, मोहक ,तन्वन्गी कविता है .

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