शनिवार, 8 जनवरी 2011

पानी मर गया है।

आईना देखते डरने लगा हूँ,
कहीं नीचे मासूमियत झाँकती है।
उतारने को बड़प्पन का मुलम्मा
उसे घिसता हूँ साफ तौलिये से।
मुँह नहीं धोता
मेरे भीतर कहीं पानी मर गया है।

12 टिप्‍पणियां:

  1. ..वाह!
    ..आईना तो सभी के पास है लेकिन कोई ठीक से देखना नहीं चाहता। बड़प्पन का मुलम्मा अपना मुंह धोने नहीं देता, आईना ही साफ करते रह जाता है।

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  2. आईना देखने ही बड़प्पन उड़ जाता है, दिखता है एक बच्चा, बड़प्पन का नकाब ओढ़े।

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  3. क्या कहूँ? कुछ कहने लायक छोड़ा कहाँ है आपने...कमाल की रचना...

    नीरज

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  4. बहुत अच्छा.
    अत्र कुशलं तत्रास्तु के पश्चात्त विदित हो...
    कि मरे हुए पानी से मुंह नहीं धुलता...नहीं धुलता बड़प्पन का मुलम्मा...मरा हुआ पानी काम आता है संवेदनाओं के अंतिम संस्कार में...
    कि जब तक जीवित हैं संवेदनाएं अंदर का पानी मर नहीं सकता...कविता में कभी-कभी झूठ... चलता है, बिड़ु !

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  5. उतारने को बड़प्पन का मुलम्मा
    उसे घिसता हूँ साफ तौलिये से।

    यह एक अनुभव प्रयोग लगा.बधाई एवं नववर्ष की शुभकामनाएं.

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  6. अब तो आइना ही मिलना मुश्किल होता जा रहा है। पोलिटिकली करेक्ट समाज में

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  7. क्या कहूँ?
    यह स्वीकारोक्ति क्या कम है?
    यह शब्द प्रवाहित होते रहें।

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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