शनिवार, 1 जनवरी 2011

आत्ममुग्ध प्रोफाइल

कुछ जलते दिये हैं पास में, 
हर रात राह खोजता हूँ-
पगडण्डियों के जाल में। 
चमकते वजूदों से है राजपथ रोशन,
सहमता हूँ फटकते वहाँ,
जहाँ पैरों के निशान न रहे।
...हाँ, मैं महत्वाकांक्षी नहीं,
पर सपने खूब देखता हूँ, 
वे जगाए रखते हैं मुझे रात में।
मैं हर रात राह खोजता हूँ,
दिन का क्या? बस यही कहना है- 
पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं। 
तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता।

13 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वर करे कि आप अपनी खोज में कामयाब हों...।
    शुभकामनाएँ।

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  2. अप्रतिम!
    आप हिन्दीब्लौगजगत के सिरमौर हैं!

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  3. स्वप्नों में राह खोजना पसन्द था पर स्वप्नों ने राह बनाने को क्योंं कह दिया?

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  4. .
    .
    .
    काश हर कोई इतना ही आत्ममुग्ध हो पाता।



    ...

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  5. ...पगडंडियों के जाल में जलते दिए लेकर राह खोजने में जो सफल हो जाते हैं वे राजपथ की ओर ही रूख करते हैं मगर आप वहाँ फटकना नहीं चाहते कि वहाँ कदमों के निशा नहीं मिलते। ...वाह ! यह आत्ममुग्धता मंत्रमुग्ध कर देने वाली है।

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  6. का मर्दवा

    नवका फोटू.....नया इस्टाईल.....नया साल.....बढ़िया है :)

    @ हाँ, मैं महत्वाकांक्षी नहीं,
    पर सपने खूब देखता हूँ,
    वे जगाए रखते हैं मुझे रात में।

    मस्त पंक्तियां हैं। एकदम मस्त।

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  7. क्या हसीन आत्ममुग्धता है...
    बेहतर...

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  8. पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं।
    तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता।


    ये पंक्तिया मुझे बेहद पसंद है ......

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  9. पास बैठो कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं।
    तफसील पूछोगे तो कह दूँगा,मुझे कुछ नहीं पता।
    बहुत अलग सा आकर्षण है इनमे।

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  10. तेरी खुदग़ुमानियों के सदके !
    ताउम्र बकबक करते रहो, मैं नायाबियाँ बटोरता चलूँगा !
    मालिक तुमको लम्बी उम्र बख़्शे !

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  11. मॉडरेशन ?
    अच्छा है गिरिजेश बाबू, अच्छा है ।
    आइन्दा आपकी पोस्ट सिर्फ़ निहार लिया करेंगे ।

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  12. bhai rao sahab ..... aap ko apne desk top pe bitha
    diya hai ..... wakai .... apki atm-mugdhta mugdh
    karne wali hai...........

    pranam.

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  13. प्रिय गिरिजेश जी,

    महत्वकांक्षी न होने के बावजूद सपने खूब देखना ही कविता को अलग बनाता है वर्ना आजकल तो सपनें भी उन्हीं आँखों में आते है जो दिनभर गॉगल से ढंकी रही किसी कुरियर की तरह जो इलीट बस्तियों तक पहुँच जाते हैं और किसी मुहल्ले के नाम पर बैग में सिमटे रहते है आखिर कोई कुरियर ब्वॉय डियो और फ्रेशनर्स को छोड़ नालियों को लांघता फिरेगा आखिर क्यों?

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी


    मेजर गौतम राजऋषी की चर्चा में मिले लिंक से यहाँ तक पहुँच पाया.... इन दिनों सर्दियों में सारे ही संकलक जमे हुये हैं।

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