शनिवार, 1 मई 2010

मैं मज़दूर नहीं ...

पसीना पहचान है
कि सब कुछ ठीक ठाक है ।
खून बह रहा है
शरीर में धातुएँ पुष्ट हो रही हैं ।
निकलता है तो होता है निर्गन्ध
टूट पड़ते हैं बैक्टीरिया, जीवाणु, वायरस
और कुछ ही देर में
गन्धाने लगता है - पसीना।
सुबह नहा धो
डियो इत्र लगा
पहुँचता हूँ ऑफिस
एसी कार से,
भाग कर घुसता हूँ एसी ऑफिस में
रूम फ्रेशनर और डियो
सुगन्ध ही सुगन्ध
संतोष होता है दुर्गन्ध नहीं
पसीना नहीं ।
पसीना मज़दूरियत को जाहिर न कर दे !
भयमुक्त  रहता हूँ सुबह सुबह।
दिन चढ़ता है -
बाहर कुछ भी तापमान हो
भीतर स्थायी तापमान 20डिग्री
- ऑपरेटर !18 रखा करो
जी साब ।
बाहर धूप में
सड़क पर, बस में, छाँव में - सर्वत्र
घन मार, जोर लगा, उइ दैया !
सखी जोर लगाओ !
टेढा है, सीधा करो !
अरे भाई हाथ लगाओ, एक से नहीं होगा।
पसीना ही पसीना
बह रहा है -
मेरा सीना - नो पसीना
विशिष्टता का सुख
शिष्टता का सुख -
दूर कहीं काम रुक गया है
हायर अप्स की विजिट है -
पेशानी पर बूँदें छलक आई हैं
तापमान 18 डिग्री ही है -
...आइ वांट रिजल्ट डियर !
ये बहानेबाजी किसी और को सुनाओ ...
साब ! गाड़ी नाके पर पकड़ी गई
आज डिलेवरी नहीं हो पाएगी -
स्टॉप दिस नानसेंस ! नैंसी !
भीतर पसीना ही पसीना
तापमान 18 डिग्री
बैक्टीरिया काम पर लग गए हैं -
बगलों से भयानक दुर्गन्ध ...
नैंसी कौन सा परफ्यूम लगाती है ?
..ओन्ली वन डे मिस्टर
टुमारो कट ...
ऑफिस का वक्त खत्म हो गया
बाहर निकलता हूँ
दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध
मज़दूर ही मज़दूर -
पसीने के बहाव घरों को जा रहे हैं
एसी कार, बस, पैदल सब बराबर
पसीना सब को बराबर कर देता है
दुर्गन्ध ज़िन्दगी का सबूत है
..साबुन में बसे मृत फूलों की गन्ध
शरीर पर रगड़ रहा हूँ -
मुझे दुर्गन्ध बर्दाश्त नहीं
मैं मज़दूर नहीं ...

16 टिप्‍पणियां:

  1. पोस्ट करने के बाद पाया कि यह इस ब्लॉग की सौवीं पोस्ट है। इसके लिए कबीर को रख छोड़ा था। लेकिन यह कविता भी मुझे ठीक ही लग रही है। छुट्टी के दिन भी मज़दूरी करने जा रहा हूँ - एक धनपशु का पसीना रुक गया है, निकालना है। :)

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  2. पसीने के बहाव घरों को जा रहे हैं
    एसी कार, बस, पैदल सब बराबर
    पसीना सब को बराबर कर देता है
    दुर्गन्ध ज़िन्दगी का सबूत है
    ..साबुन में बसे मृत फूलों की गन्ध
    शरीर पर रगड़ रहा हूँ -
    मुझे दुर्गन्ध बर्दाश्त नहीं
    मैं मज़दूर नहीं ...
    ...Majdoron ke manodasha ka vastavik maarmik chitran.... Azadi ke baad bahut sudhar majdoron mein dikhata nazar nahi aata.....sirf vote bank aur naarebaaji ke alawa inka kuch bhale ki soch ho.. yah kam dikhta hai... aur to aur inke prati samvedana bhi baaki nahi dikhti...
    Majdooron ko saparpit samvedansheen aur yatharth rachna ke liye aabhar....

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  3. क्यों झूठ बोलते हैं घर में तो सब मजदूर हैं।
    बिना पसीना बहाये किसी को भी रोटी नही मिलती।

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  4. majdoor to ham sabhi hain...par jo majdooro ki paribhasha ham jaante hain...uska achcha chitran kiya....

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  5. बहुत बड़ी है मजदूरों की जात
    पर उन में से तीन चौथाई
    जानते नहीं
    जानते हैं तो मानते नहीं
    कैसे एक कौम बनें?

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  6. मज़दूर दिवस पर मज़दूरों का बेबाक चित्रण।सच मे हैं तो हम सभी मज़दूर मगर अपने आप को मज़दूर नही समझने की आदत से मज़बूर हैं।मैं भी उनमे शामिल हूं,करता हूं नौकरी और खुद को सेठ समझता हूं।और जो कुछ भी लिखा मुझे ऐसा लग रहा है कि हम जैसे सेठ्नुमा मज़दूरों को बहुत करीब से देख कर लिखा है।पर्फ़्यूम से लेकर दुर्गंध!क्या बात है।कल ही मैंनें भी गाड़ी का एसी चेक करवाया,कूलिंग कम थी।45 डिग्री से.कितना दम मारेगा एसी भी।
    मज़दूर दिवस पर एक सच्चे मज़दूर को हम जैसे छद्म-मज़दूरों का सलाम,लाल सलाम।

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  7. @ रचना जी,
    आप की टिप्पणी गृहिणी और नारी समाज से जुड़ती है। कोई भी अभिव्यक्ति सम्पूर्ण नहीं होती। यह यहाँ भी सत्य है। मैंने बस एक पक्ष रखा है। आज अशोक पाण्डेय ने एक अच्छा लेख 'मई दिवस और महिलाएँ' लिखा है http://naidakhal.blogspot.com/2010/04/blog-post_30.html
    पढ़िएगा। शुभकामनाएँ। कल मैं आप दम्पति को फोन कर रहा था - वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनाओं के लिए। कोई जवाब ही नहीं आया। मैं अभी तक रिसियाआ हूँ।

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  8. ऑफिस में 18 और घर में 48. महोदय आपकी तो क्वेन्चिंग हो जायेगी ।

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  9. .एक मजदूर के दिल में उतर कर उसकी असली पीड़ा को रेखांकित किया है आपने

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  10. पड़ोसन आंटीजी रोज टोक देती हैं ...इतने धूप में क्या कर रही हो ...पसीने की दुर्गन्ध तो बुरी लगती है ...घर की मजदूरी करते हैं तो क्या ...!!

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  11. बहुत गहराई से वेदना उकेरी है मजदूर की.

    १०० वीं पोस्ट की बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ.

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  12. एक बेहतर कविता...
    ....पसीना मज़दूरियत को जाहिर न कर दे !
    ....मुझे दुर्गन्ध बर्दाश्त नहीं
    ....मैं मज़दूर नहीं ...

    और क्या खूब... मज़दूर दिवस पर...

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  13. पसीना और दुर्गन्ध -ये पब्लिक सेक्टर वाले नहीं जानते भैया आप लोग फर्क कर सकते हो ...

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  14. एक मजदूर के दिल में उतर कर उसकी असली पीड़ा को रेखांकित किया है आपने////////

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  15. .
    .
    .
    मेहनत से किये काम का
    मजदूर-मेहनत के रिश्ते का

    सबूत देती हुई यह गन्ध
    है मजदूर के पसीने की

    मज़दूर ही मज़दूर, लिये
    पसीने की गन्ध घरों को जा रहे हैं

    एसी कार, बस, पैदल सब बराबर
    पसीना सब को बराबर कर देता है

    यह गन्ध ज़िन्दगी का सबूत है
    यह गन्ध मुझे बहुत पसंद है

    यह गन्ध है तभी तो जिन्दगी है
    हम हैं तुम हो और है सुगंध

    आओ एक लंबी सांस लें
    ताकि यह गन्ध उतर जाये

    दिल-दिमाग के हर कोने में
    भेद मिट जाये मजदूर का... हमसे!



    १०० वीं पोस्ट की शुभकामनाये!

    आभार!

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  16. नेचर ने सबको एक ही बनाया है.. सबको एक ही सडी हुयी पसीने की गन्ध दी है.. कुछ ’ऎक्स’ से छुपाते है तो कुछ ऐसे ही जीते जाते है.

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