सोमवार, 31 मई 2010

केवल कष्ट है।

बस वही है

वहीं है जीवन

जो

जहाँ

मित्रों के साथ बतिया लिए हँस लिए

किसी सुन्दर शरीर को जी भर सराह लिए

सड़क पर चलते किसी से छिप कर 'रेस' लगा लिए

किसी पत्थर को ले हाथ यूँ ही गड्ढे में उछाल दिए

आँख में चुभती धूल को बिसरा नभ निहार लिए

किसी बच्चे को दुलरा दिए -

बाकी सब अंट शंट है

भ्रष्ट है

सबको चीरता

केवल कष्ट है ।


15 टिप्‍पणियां:

  1. जिन्दगी को समझने का आपका अंदाज पसन्द आया।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. सत्य वचन सात्विक वचन -वेलकम बैक !

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  3. सच ! अभी पुरुष में इतनी ताकत नहीं, जो मेरा सामना करे, किसमें है औकात ? http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html मुझे याद किया सर।

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  4. जीवन यही है शायद, पर अधिकतर की पहुंच में नहीं है। यही कष्ट हम सभी को किसी ना किसी रूप में चीरता है, बाकि सब कुछ भ्रष्ट लगता है। कविता के कई मासूम इशारे अच्छे लगे।

    शुक्रिया।

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  5. नीचे समसन्दर्भ में सांवली भी आ रही है बन्धु....कष्ट कैसा :)

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  6. कभी रो लिया, मुस्कुरा लिया
    कभी हँस दिया, गुनगुना लिया
    जुबान फिसलती रही कभी
    कभी सिर्फ मौन ...
    कष्ट है फिर भी ...
    ये भी जीवन है ...!!

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  7. जीना इसी को कहते हैं शायद। अपन तो ऐसे ही जीने पर भरोसा भी करते हैं। आभार बेहतर रचना के लिए।

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  8. शायद जीवन को इस से अधिक सरल तरीके से परिभाषित नहीं किया जा सकता........


    इस सहजता को सादर नमन!

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  9. अंट शंट भ्रष्ट ही ज्यादा है लग रहा है... बाकी ये जो भी है मस्त है. शुरू के दो तो हमारे आस पास हमेशा ही है :)

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