गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

आज नीयत डगमगाई है.


आज आप की ग़जल गुनगुनाई है। 
लगता है जैसे हमारी बन आई है। 

सुर ढूढ़ता रहा जिस्म-ए-साज में 
आज जाना ये शै आलमें समाई है। 

मतला, वजन, धुन,काफिये, बहर  
मेहरबाँ, अनाड़ी ने महफिल सजाई है। 

मिलेंगे उनसे आँख मिला कर पूछेंगे
हो इनायत, आज नीयत डगमगाई है।  

चुप होंगें वे, हँसेंगे आँखों आँखों में 
हुआ गजब,काफिर ने दिखाई ढिंठाई है।

सजाओ बन्दनवार गद्दी सँवारो पुकारो 
बहक लहकी फिर,हर बात जो भुलाई है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. मतला, वजन, धुन,काफिये, बहर
    मेहरबाँ, अनाड़ी ने महफिल सजाई है।


    सजाई बहुत खूब है लेकिन..वाह वाह कहें..कह दिया!

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  2. न कहें सरकार। सजावट की तारीफ ही क्या कम है !

    इस महफिल में आप आए यही बहुत है
    कभी खुद को कभी अपनी साइट देखते हैं ।

    वाह वाह ! क्या शेर कहा! सुभानअल्ला!!
    अबे चुप्प, भौंड़ी नकल मारे हो :(

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  3. मतला, वजन, धुन,काफिये, बहर
    मेहरबाँ, अनाड़ी ने महफिल सजाई है।

    ऐसे अनाड़ीपन की ही तो कामना है।

    यूँ ही सजाते रहे अनाड़ी महफिल को
    इसी सजावट में सुमन की भलाई है

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  4. नीयत डगमगाई काफिर की तो वह भी साल के जाते जाते।

    नववर्ष पर आप को बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

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  5. कहाँ नीयत डगमगा ली ...किसकी ग़ज़ल गुनगुना ली..
    कुछ भेद तो खोलिए ...

    बात ही बात मे गीत कविता ग़ज़ल नज़्म लिखना तो कोई आपसे सीखे ...
    नववर्ष की बहुत शुभकामनाएँ ...!!

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  6. काफिर तो आप कभी न थे आज ये आत्मोसर्ग का कैसा जूनून ?
    और धीरे से ये गजल भी घुसाए हैं -जोरदार है !
    कहीं कोई इम्प्रेस न हो जाय !

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  7. आज आप की ग़जल गुनगुनाई है।
    लगता है जैसे हमारी बन आई है।

    सुर ढूढ़ता रहा जिस्म-ए-साज में
    आज जाना ये शै आलमें समाई है।
    बहुत खूब, लाजबाब ! नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये !

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  8. इक काफ़िर ने क्या ग़ज़ल पढ़ाई है
    आँखों से सीधी दिल में उतर आई है

    नववर्ष की बहुत शुभकामनाएँ ...!!

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  9. मिलेंगे उनसे आँख मिला कर पूछेंगे
    हो इनायत, आज नीयत डगमगाई है।

    वाह! बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ ...बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

    थोड़ी मौसम की भी गलती है......



    (NB:--भई.... आपने देखा होगा कि खेतों में....एक पुतला गाडा जाता है .... जिसका सर मटके का होता है... उस पर आँखें और मूंह बना होता है.... और दो हाथ फूस का..... वो इसलिए खेतों में होता है.... कि फसल जब पक जाती है ..... तो कोई जानवर-परिंदा डर के मारे न आये...... मैं शायद वही पुतला हूँ.... )

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  10. बहुत सुंदर गजल,
    नुतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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  11. नववर्ष आपके और आपके समस्त परिवार के लिए मंगलमय हो ...
    बहुत बहुत शुभकामनायें....!!!

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  12. @आज आप की ग़जल गुनगुनाई है - हमारी, आपकी का कैसा भेद, क्यों?
    @"सुर ढूढ़ता रहा जिस्म-ए-साज में
    आज जाना ये शै आलमें समाई है"
    - समझ में आयी न बात! भटके कितना !
    @"मतला, वजन, धुन,काफिये, बहर
    मेहरबाँ, अनाड़ी ने महफिल सजाई है"
    - झूठे ! इस पर न्यौछावर यह ब्लॉगजगत ।
    @"मिलेंगे उनसे आँख मिला कर पूछेंगे- मतलब फिर ज्यादा आत्मविश्वास !
    @"चुप होंगें वे, हँसेंगे आँखों आँखों में
    हुआ गजब,काफिर ने दिखाई ढिंठाई है।"
    - नहीं, नहीं, काफिर को अक्ल आई है !
    @"सजाओ बन्दनवार गद्दी सँवारो पुकारो
    बहक लहकी फिर,हर बात जो भुलाई है।"
    - कब तक याद रहेगी! तबियत ही ऐसी है ।

    हम तो चहक उठे ! टिप्पणी जो हो गयी !

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  13. हमें तो न दिखा नीयत डगमगाना। ठीक ही तो है।
    कविता लिखने भर से नीयत नहीं डगमगाती। उसके लिये कोई और तरह का कलेजा चाहिये! :-)

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  14. वाह-वाह। क्या ग़ज़ल सुनायी है।
    हम तो मर मिटे इस अनाड़ीपन पर।

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  15. अगर भाषा को तोडने मरोडने की इजाजत दें तो कहूंगा की आपने गजब ढाई है।

    नव वर्ष की अशेष कामनाएँ।
    आपके सभी बिगड़े काम बन जाएँ।
    आपके घर में हो इतना रूपया-पैसा,
    रखने की जगह कम पड़े और हमारे घर आएँ।
    --------
    2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकन
    साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के पुरस्कार घोषित।

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