शनिवार, 13 नवंबर 2010

बैठो मेरे पास



बैठो मेरे पास कि मेरी बकबक में नायाब बातें होती हैं,

गर पूछोगे तफसील तो कह दूँगा - मुझे कुछ नहीं पता।


8 टिप्‍पणियां:

  1. जब कुछ नहीं पता
    तब इतना बता
    किसकी है खता
    जो करता लापता
    और खुद ही खोजता

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  2. खो जाओगे पल में यादों के, उड़ जाओगे नील गगन में
    जब ढूंढोगे ज़मीन तो कह दुंगा-कुछ मेरी नहीं खता।

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  3. देवेन्द्र जी,
    इसे पूरा किया जाय। एक द्विपदी मैं और एक आप। शुरू करें?
    बाकी लोग भी निमंत्रित हैं - इंटरैक्टिव कविताई के लिए।

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  4. इंटरैक्टिव कविताई !
    हा..हा..हा..सिद्धार्थ जी को निमंत्रण भेजिए..तुकबंदी कर के गए हैं..सुर-भाव भी पकड़ लेंगे...आज उनकी छुट्टी है। मीटर साधने में दिमाग का फ्यूज उड़ जाएगा अपना।

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  5. जिन्दगी का मज़ा है ही तब तक,
    जब तक कुछ पता नहीं।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. 'ये कैसी बातें की हैं रफ्ता रफ्ता......
    गोया आप कोई हों शायर सजा-याफ़्ता...........!'


    वैसे ये क्रिएटिव कविताई "खस्ता-शेर"
    @http://khasta-sher.blogspot.com/
    पर खूब जमेगी...

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  8. कविताई की होमो-तिकड़बंदी फिन सुरु होई का ....... :) |
    ~ दर्शनाभिलाषी

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