रविवार, 14 नवंबर 2010

तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ? - 1

तुम जो आज आई हो
इस घर की देहरी लाँघ
वह देहरी जो ऊँची थी, बहुत ऊँची,
हमारे प्रेम से भी –
आज तुम्हारे स्वागत में झुकी है
ऐसी कि सगुन साटिका से अनुशासित
तुम्हारे रुन झुन कदम भी उसे लाँघने में सक्षम हैं।  
तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ?

कलंकिनी नहीं तुम अब, लक्ष्मी हो
जिसके संतति धन से
परम्परा के ब्याज चुकाए जाएँगे
और मूल मन में रह जाएँगे
चमकते सिक्कों से कुछ ऐसे धन –
छिप कर मिलना
हताश होना
साथ साथ मरने की कसमें
पिताओं के क्रोध
माताओं की घृणाएँ
ममता की बलाएँ
जमाने की थू थू।
अब जब कि धन धन में
सब धन्य हैं
तुम्हारे ऊपर कौन धन वारूँ?
तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ?  

तुम्हारे कदम जमीन पर न पड़ें
इसलिए माँ ने डलियाँ बिछाई हैं
दस्तूर नहीं, सचमुच हरसाई हैं।
मुक्त चलो मेरी प्रियतम!
भू से आँसुओं की कीच अब सूख चुकी है
हम मिल गए हैं
और कोई अनर्थ नहीं हुआ!  
नक्षत्र वही हैं
सुबह शाम वैसी ही होती हैं
बच्चे अब भी स्कूल जा रहे हैं
दो और तीन अभी भी पाँच हैं
सूरज चाँद अभी भी चमकते हैं
और  
चाँदनी सुहाग कक्ष की छत को भी नहलाएगी
ठीक वैसे ही जैसे पापी आलिंगन को नहलाती थी।
तो बताओ
इस संस्कार स्नान के बाद
तुम्हारा स्वागत मैं कैसे करूँ? (जारी)


चित्राभार: http://media.photobucket.com

15 टिप्‍पणियां:

  1. आज कोई वर्षगाँठ है क्या जी...? इतनी रात गये स्वागत की तैयारी?
    स्वागत नहीं आलिंगन/अवगाहन करना मांगता है जी...

    शुभकामनाएँ।

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  2. स्वागत अभी जारी है, मन भाव रोक लिये हैं कहने को।

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  3. रेखा चित्र सुन्दर है ..क्या खुद का बनाया हुआ है ?

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  4. यू पी , बिहार में नववधू के गृहप्रवेश की छवि साकार हो गयी है ...खूबसूरत अभिनन्दन ...
    फालतू पोस्ट पढने से बचते रहिये , टिप्पणी झेलिये ..:)

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  5. मेरे ख्याल से सारी कविता भावनाओं के स्केल पर पालित पोषित है सो आलोचना की गुंजायश कम ही बनती है पर विरह में बहाए गए आंसुओं का इतना कम होना खटकता है कि वहां पर कीच बन जाए ,आंसुओं की बाढ़ ,जल जल ,समंदर और खारेपन से निपटने की जुगाड सोचने का वक़्त है !
    इस कविता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा ,देहरी उर्फ दहलीज़ है जो घर ही नहीं बल्कि मन के प्रवेश द्वार सी , संबंधों में निषेध और अनुमति का प्राथमिक साक्ष्य अभिलेख हुआ करती है ! प्रतिबंधात्मक ऊंचाई और स्वागत / अनुमति के समर्पण सा झुकाव दहलीज़ में ही बसते हैं ! सो दहलीज़ इन दो विरोधाभाषी ज़ज्बों की अभिव्यक्ति का महती और एकमेव प्रतीक लग रही है !
    परिजनों की असहमतियों से सहमतियों की यात्रा में प्रेयसी के स्वागत की दोयम पायदान पर ढकेला जाना हर प्रेमी की नियति है ! कविता में उसकी इस विवशता का बखान असहज नहीं लगता !
    बहरहाल सुन्दर कविता !

    [एक तगड़ी सी टिप्पणी लिखी थी जिसे आपका टिप्पणी बाक्स खा गया अब रिस्क लिए बगैर दोबारा से लिखी हुई को फ़ौरन छाप रहा हूँ ]

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  6. अली जी,
    धन्यवाद। इतने सतर्क पाठन के लिए और बाकी के लिए भी :)

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  7. मान्यवर
    नमस्कार
    बहुत सुन्दर
    मेरे बधाई स्वीकारें

    साभार
    अवनीश सिंह चौहान
    पूर्वाभास http://poorvabhas.blogspot.com/

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  8. 'छिप कर मिलना
    हताश होना
    साथ साथ मरने की कसमें
    पिताओं के क्रोध
    माताओं की घृणाएँ
    ममता की बलाएँ
    जमाने की थू थू।'
    - भले ही मिस करें यह सब एडवेंचर, पर हमेशा चलनेवाले तो थे नहीं. हाँ ,उस से इस मनस्थिति में आने में 'कवि'को ज़रूर अटपटा लगेगा.
    अब आगे और देख .

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  9. अरे ,लिखते-लिखते ग़ायब हो गया !अभी तो पूरा हुआ भी नहीं था .
    दुबारा पढ़ कर देखा-सोचा भी नहीं था !,
    गिरिजेश जी ,ऊपर वाला कमेंट अचानक चला गया ,कुछ अन्यथा न लें. 'पूर्वावलोकन ,पोस्ट करें' कोई स्टेप हुआ नहीं -आश्चर्य है मुझे..

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