सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

फागुन फागुन ......फागुन फागुन

(1) 
फागुन ने चूमा
धरती को -
होठ सलवट 
भरा रास रस। 
भिनसारे पवन 
पी गया चुपके से -
.. खुलने लगे
घरों के पिछ्ले द्वार । 
(2) 
फागुन की सिहरन 
छ्न्दबद्ध कर दूँ !
कैसे ?
क्षीण कटि - 
गढ़न जो लचकी ..
कलम रुक गई।
(3) 
तूलिका उठाई - 
कागद कोरे
पूनम फेर दूँ।   
अंगुलियाँ घूमीं 
उतरी सद्यस्नाता -
बेबस फागुन के आगे। 
(4) 
फागुन उसाँस भरा 
तुम्हारी गोलाइयों ने -
मैं दंग देखता रहा
और 
मेरी नागरी कोहना गई ।
लिखूँगा कुछ दिन
अब बस रोमन में -

11 टिप्‍पणियां:

  1. तूलिका उठाई -
    कागद कोरे
    पूनम फेर दूँ।
    अंगुलियाँ घूमीं
    उतरी सद्यस्नाता -
    बेबस फागुन के आगे।

    बहुत सुंदर पंक्तियाँ....

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  2. फागुन की सिहरन
    छ्न्दबद्ध कर दूँ !
    कैसे ?
    क्षीण कटि -
    गढ़न जो लचकी ..
    कलम रुक गई।


    -वाह!! सभी उम्दा!!

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  3. शुक्र मनाइए नागरी खाली कोहना गई गई....
    झाडू-झउवा नहीं ले आई ...
    और आप रोमन से बहुते चिढ़ते हैं...इसी लिए कह दी होंगी ...आज के बाद खाली रोमन में लिखना है....बढियां सजा मिला है आपको...हाँ नहीं तो...:):)

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  4. पंजाबन, बंगालन, मद्रासन, मराठन,गुजरातन तो सुना था
    लेकिन रोमन ??

    लगता है फागुन जोर में है :)

    बोल जोगीरा सारा रारा.......

    मस्त लिखा है। एक दम झकास।

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  5. फागुन में बबा देवर लागी .
    क्या खूब चड़ा है रंग फागुन का.............

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  6. फागुन की सिहरन
    छ्न्दबद्ध कर दूँ !
    कैसे ?
    क्षीण कटि -
    गढ़न जो लचकी ..
    कलम रुक गई।
    अच्छी लगी ये पंक्तियाँ !

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  7. गोलाइयाँ उसाँस लें तो नागरी बहक-सहक जाये,कोहनाये क्यों ? गोलाइयों से तो सजती है उसकी देंह !
    रोमन निपट तिरपट - फागुन में उसकी कैसी प्रीति !
    उल्टा-सुल्टा लिख कर फगुनाई में भाव-ताव टाइट करते हैं ! ठीक नहीं यह !

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  8. उतरी सद्यस्नाता -
    बेबस फागुन के आगे।

    बहुत सुंदर पंक्तियाँ.

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