सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

बसन तन पियर सजल हर छन

यह कविता देवेन्द्र जी के इस गीत को पढ़ने से उपजी है।
हमरा कउनो कुसूर नाहीं है।
इसमें किसी के लिए छिपा सन्देश भी है। आशा है समझ जाएँगें।

____________________________________________
बसन तन पियर
सजल हर छन।

हरख हरखन
टुटल बरत
नवरतन बरजन ।

मदन अगन मगन मन
हर मन सगुन धुन
गुन गुन ....

ह म श टुन टुन
खदकत अदहन धुन!
..अवगहन

बसन तन पियर
सजल हर छन
छन छ्न ...
___________________________

सरलार्थ:
बसन - वस्त्र, पति
पियर - पीला, प्रिय
सजल - नवरस से भरा, सजा हुआ
छ्न - क्षण, छन छन की ध्वनि
हरख - हर्ष
हरखन - प्रसन्नता
टुटल - टूट गया
बरत - व्रत
नवरतन - नवरात्र, नव-रति
बरजन - वर्जना
अगन - अग्नि
सगुन - शुभ आगम का संकेत
खदकत - खौलता हुआ
अदहन - चावल पकाने के लिए चूल्हे पर चढ़ाया हुआ खौलता पानी
अवगहन - अवगाहन, कोई बात जानने या समझने के लिए उसके संबंध में की जानेवाली खोज, छान-बीन या मनन

20 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! क्या बात है!!
    हमसे दो कदम आगे ...अभी अपूर्व जी के प्रश्न का उत्तर शेष है?
    आयो रे बसंत चहुँ ओर....
    हरख हरखन
    टुटल बरत
    नवरतन बरजन
    खदकत अदहन!
    ..अवगहन
    आयो रे बसंत चहुँ ओर....

    ...ह म श

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  2. तुकबंदी तो ऐसी भिडाई गई है मानो पुरानी लकडी वाला दरवाजा भिडाया हो, खोलते समय तो चुर्र चुर्र बोला और बंद होते ही बोला -

    भडाक :)

    बढिया है।

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  3. मुझे तो यह बाल पोथी की लाईने लग रही हैं ..पोथी पढ़ पढ़..

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  4. पूरा बसंतियाये हुए हैं आप भी...बात का है ??
    और ई माँ जो संदेसवा है ...उहो हम समझ गए हैं....
    काहे को टुन्ना को टुनटुना रहे हैं महराज...छेड़ने से बाज नहीं आवेंगे का :):)
    कहीं ह म श भड़क गए तो लेवे के देवे पड़ी.... हाँ नहीं तो....

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  5. हा म श चलत तन तन ....
    बरजत मन
    करत लाख जतन
    वरत मौन ...:):)

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  6. आपकी यह कविताई इसलिये पचा जाता हूँ कि देखता हूँ हाव के पीछे भाव दौड़ा चला आ रहा है, नहीं तो हाव-भाव डराता ही है ऐसी कविताओं का !

    संकेत तो हमहूँ समझ गये :) चुप्पै रहैं न ?

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  7. @ हिमांशु जी
    आह्लाद में कभी कभी नाचने को मन करता है। अब नाचना तो आता नहीं लेकिन शब्दों और ध्वनियों के साथ हाव हाव करते ठुमका लगाना आता है।
    अभी तक मस्त हूँ, बार बार पढ़ कर प्रसन्न हो रहा हूँ।
    फागुन आ रहा है और नृत्य में जोड़ीदार तो चाहिए न !
    "इमली का बूटा बेरी का पेंड़
    इमली खट्टी मीठे बेर
    इस जंगल में हम दो शेर
    चल घर जल्दी हो गइ देर.. धिनक धिनक धिन तारा धिनक धिन रे !"
    .
    .

    जरा ध्यान से देखें पढ़ें आर्य ! सिर्फ शब्दों का खेल या बाल पोथी(कर्टसी - बड़के भैया) की लाइनें नहीं हैं ये ! भाव के साथ भी बहुत कुछ इसमें है...
    धिनक धिनक धिन तारा धिनक धिन रे..

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  8. गिरिजेश राव साहब, आदाब
    ?????
    देवेन्द्र जी...!!!
    (कुछ न समझे खुदा करे कोई)

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  9. मुझे बचपन का वह चूल्हा याद आया जिस पर एक काँसे (फूल )के भगौने में माँ दाल का अदहन रखती थी और उसके खदकने की धुन मुझे मोहित करती थी

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  10. अदहन खदकत भदर-भदर
    ढक्कन खड़कत खड़र-खड़र
    करछुल टनकत टनर-टनर
    लौना लहकत लपर-लपर

    बटुली महकत महर-महर
    पहँसुल कतरत खटर-खटर
    सिलबट रगड़त चटर-पटर
    लहसुन गमकत उदर-अधर

    राम रसोई हुई मुखर
    कविता बोली देख इधर :)

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  11. सिद्धार्थ जी के यहाँ अभी कमेन्ट कर के आया हूँ , ५० प्रतिशत वही बात
    यहाँ भी रख रहा हूँ .. आपत्ति वही .. क्षमा कीजियेगा .. !!!

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  12. आचारज जी!

    न तो देवेन्द्र जी का गीत जड़-रवायत है और न मेरी बन्दिश। और सिद्धार्थ की कविता रसोई का गीत है।
    जरा उस उल्लास को समझें ।
    प्रयोग 5 मिनट में नहीं किए जाते, बस मन नृत्य करता है, अक्षर सजते हैं और बन्दिशें की बोर्ड पर उतर आती हैं।
    पहले भी होता रहा है - कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि हो या ताक कमसिन वारि या ससुराल गेंदा फूल हो..
    .. इमली के बूटे, बेरी के फूल और घर जल्दी जाने में कोई संगति नहीं बस उल्लास है ...
    ..जाय दो ! फागुन का जानें कठ करेजी !!
    हम त होली तक अइसहि करबे, कोई कोहनाय तो उसकी बला से ...बड़े आए आचारज ! हुँ ।
    ______________________


    हँ, इहो बताय दो कि उहाँ का कौन सा 50% वहीं छोड़ आए हो और कौन सा 50% इहाँ लाए हो? दिल्ली में नाहीं पता लेकिन नखलौ माँ फगुनहट बहने लगी है और इस मौसम में 100 गुनाह मुआफ और 1000 गुनाह बेशरम हो किए जात हैं... क्षमा जी से मेरी क्षमा बोल दीजिएगा।

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  13. ...वैसे मुझे कविताओं की समझ जरा कम है..फिर भी अच्छी लगी रचना साधारण पाठक की हैसियत से.

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  14. भईया ! समझे नहीं आप भी ! फगुनाई में सब उलट-पुलट के ही सोच रहे हैं । जरा खयाल कर फिर से पढ़े,मैं खुलने लगूँगा ।
    झूठ-ही रिसिया गये !
    मतलब तो समझें ! रचना का वसन बनने दें ! मैं उसी की बात तो कर रहा हूँ । जहाँ हाव के पीछे भाव नहीं, वहाँ ठहरा रहे हैं । निराश हुआ कि हाव-हाव में ही उलझा रहे हैं !

    अब यह बताइये मैं यहाँ क्या सोच कर आऊँ - यह सोचकर कि भोजन करने जा रहा हूँ, पथ पर हाव-हाव नाचने जा रहा हूँ या यह सोचकर कि दुर्योधन का मेवा छोड़ विदुर का शाक खाने जा रहा हूँ, चित्रकूट की राह जा रहा हूँ, जिसमें राम के चरण-चिह्न मिलेंगे !

    बाकी मेरा सर, आपकी ओखली !

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  15. नाहिं रिसियाए हम आचारज जी

    बसन वसन कहें आचारज जी
    ब कहें व कहें भाव जोहें आचारज जी

    हाव हाव ठुमकें हम आचारज जी
    ओखर कपार आचारज जी

    अचरज जी ?

    अरे फागुन जी!

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  16. पुनश्च: साधारण पाठक के लिए असाधारण रचना और प्रकारांतर से मेरे जैसे कथित आसाधारण पाठक के लिए साधारण !
    तभी बालपोथी याद आयी ..कुछ और लोग भी रचना समझ नहीं पाए हैं और उनकी पीड़ा पढ़ दुबारा यहाँ लौटा हूँ .
    मदन चंचल मदमस्त पहल करत
    पवन सनसन जी धनधन कहत
    मन धकधक जनजन हलचल
    पलपल धड़कन बढ़त
    परत दर परत खुलत
    चल हट भल अगर चहत

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  17. कस्सम से.. बसंत क्या आया, लोग 20 जनवरी से ही बौराय गये हैं.. मनो क्या कहें.. हद है!

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  18. सतीश पंचम जी की आवाज जोरदारी से बुलंद करता हूँ...

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  19. लोगों से कहिये अपनी अपनी व्याख्या भी ठेलते जाएँ टिपण्णी में :)

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