बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

साखी

रात नम तुम्हारे होठों की तरह
लाज की बात है आँखें मूँदनी हैं
मुझे चूमनी हैं साँसें अंधकार में
ऊष्ण उड़ेगी निविड़ में प्रीत सन
प्रात कसे जग हमें जो शुचिता पर
साखी होंगी बूँदें टँगी दूब पर!
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- गिरिजेश राव 201310302254 

2 टिप्‍पणियां:

  1. रात की हो प्रात से यह बात नित ही,
    तृप्त मन की आस सिमटी संघनित सी,
    व्याप्त मेरी देह में अनुकूल सिहरन,
    ओस बनकर टिमटिमाती संफलित सी।

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