रविवार, 19 दिसंबर 2010

अनगढ़ गीत

आज गाऊँगा 
वह अनसुना गीत 
जिसे सुना 
याद की लू झुलसते। 

नमी 
पनीली आँखों में
होठों की नरम लकीरों में। 
साँस तपिश  
होठ सूखे
चुम्बन भिगोए  
आँच सुलगते। 

देह घेर
हाथ फिसले 
छू गए स्वेद 
वस्त्र शर्माते रहे। 
न समझे कि  
चिपकी उमस, 
शीतल हवा चली 
जो शाम ढलते।   

8 टिप्‍पणियां:

  1. अचानक से लैपटॉप गियर बदल कर यादों की लू झोंकने लगा। ठंडी रजाई कुछ गर्म हुई। डूबने में झुलसने की संभावना है।

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  2. बढियां गीत शर्वरी -बस अनुसुना को अनसुना कर दीजिये

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  3. शिशिर में गीष्मानुभव, यादों का लू जैसे चलना....
    उद्विग्नता को विश्राम दें कविवर।

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  4. देह की वेदिका पर हवन हो गयीं
    प्रेम के वेद की संहिताएं सभी

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