रविवार, 12 दिसंबर 2010

...वश में नहीं

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सिल गए हैं 
बोलना अब भी नहीं
सुनना कैसे हो?
बोलना तब भी नहीं था
जब अधखुले होते थे
मैं सुन लेता था बहुत कुछ
बस आँखों से।
तुम कहती थी-
एक कान से सुन दूसरे से निकाल देते हो -
तुमसे कुछ कहना बेकार है।
मैं पूछता था -
तुमने कहा था क्या कुछ?
होठ ऐंठ कर रह जाते
बस मिल जाते
कहना कैसे हो?




soul-mate

हाँ कहा था कभी
"मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता।"
जीवित हूँ तुम्हारे बिना
जान चुका हूँ जीना मरना अपने वश में नहीं।
अपनी कहो
जीवित कैसे रह गई?
साँसें हमारी एक हैं
क्या इसलिए?
बात वही रह गई न!
"मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता।"
वाकई जीना मरना अपने वश में नहीं!

11 टिप्‍पणियां:

  1. उफ! ये ओंठ!!
    कविता के भाव में जो ऐंठना है उससे भी मेल नहीं खाते
    भयावह!
    दिमाग तो यही ले गये।

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  2. अवश जीवन,
    कितनी चाहें,
    कैसी राहें,
    ढूढ़ें नित ही,
    व्यक्त निगाहें।

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  3. चित्र और कविता को देख कर सहज ही मन में अंजाना अंजानी के ये लिरिक्स गुनगुनाने लगे.....

    नैनां लगिया बारिशा ते सुके सुके सपणें वी भिज गये.... :)

    मस्त कविता है।

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  4. बिना कहे भी बात होती है…………ये दिल के सौदे ऐसे ही होते हैं……………कब किसी के वश मे होते हैं।

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  5. इसकी गहनता पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ
    हाथ नहीं आ रही...।
    लगता है छूने पर करेंट लग जाएगा।

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  6. साँसें तो एक ही हैं..मन के भाव भी....ना किसी के मन के भाव मिटे, ना सासें...
    बड़े सूक्ष्म भाव हैं कविता में...और एक विश्वास भी..प्रेम का उद्दात्त रूप

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  7. जान चुका हूँ जीना मरना अपने वश में नहीं।
    अपनी कहो
    जीवित कैसे रह गई?

    :( से :) के बीच का सार मिल गया मुझे इनमे...

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  8. अब न आदत रही गुनगुनाने की वो
    मुझसे लिखने का सारा हुनर ले गयी
    कल झुकाकर नज़र रो पड़ी और फिर
    मेरे सपनों की पूरी उमर ले गयी.

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  9. सैद्धान्तिक या दार्शनिक अन्दाज में शायद इसी को कहा जाता है कि...जीवन चलता ही रहता है ....अविरल सतत ! चाहे कुछ भी हो !

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  10. इन होठों की उम्र कितनी है या ये कितने उम्र के होंठ हैं ?

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