मंगलवार, 20 जुलाई 2010

अपनेपन की ठगाई !

सजी बारात
मेरी शादी
वह रात
बुरी रात लगी
सुनसान लगी
तुम जो न थी !

दोस्तों के बीच मुशायरा
कहकहे, वाह वाहियाँ
आहें
मैं खामोश
 बके जा रही
जुबाँ मशीनी
झुकती नज़रें न थीं
तुम्हारी आहें न थीं !

कंगन खुलने की बेला
शाम-ए-सुहाग रात
तुम आईं
मैं हुआ भैया
वह भौजाई
चौंक देखा उसने
ये कैसी आवाज़
आँखें डबडबाईं
होठ मुस्कुराते
रिश्ते बदले
बस लम्हे दो लम्हे !

लिख गया सब कहानी
उसके मन पर जुबानी
मेरा चेहरा जो उतरा
हुई रंगत बेपानी

कैसी थी वह रात !
एक शौहर ने सुनाई
अपनी इश्क की कहानी
लरज उठे थे आँसू
बह चले थे आँसू
दो दिल बस धड़के
रात भर थे धड़के
भोर ने दिखाया
वह तारा अकेला
जिसकी  साखी कभी
हमने लिक्खी थी
अनूठी
प्रेम कहानी ।

सुबह निखरी
ठन ठन ठिठोली
वह भाभी तुम ननदी
नज़र उठा
जो देखा
तुम दोनों ने हँसते -
मैंने जाना
क्या होती है
अपनेपन की ठगाई !

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत पहेलियाँ बुझते हो राव साहब कविता में ... हम तो आख़री तक दिमाग़ ही लगाते रहे ।

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  2. अक्सर विवाहित जीवन के कई अंशों में इस तरह अपनेपन की ठगाई देखी जाती है। पत्नी से कहता हूँ टिफिन में चार रोटी ही रखना ज्यादा नहीं....पत्नी कहती है हां वही रखा है......। दोपहर में ऑफिस के दोस्तों के बीच जब टिफिन खोला जाता है तो पाँच रोटियाँ निकलती हैं।

    यह और इस तरह की ठगाई का आनंद ही अलग होता है :)

    सुंदर कविता।

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  3. तीसरी बार पढने पर रिश्ते बदलने वाली बात समझ में आई. और फिर प्रेम कहानी... वेल ऐसे अपनेपन के लिए रिश्ते तो बदलने ही पड़ेंगे ! हाँ 'तुम दोनों ' की समझ और अपनेपन की बहुत जरुरत है.

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  4. कविता लाजवंती की लज्जा की तरह देर से अपने अर्थ खोलती है..और तब ही अपनेपन की ठगाई का अर्थ समझ आता है..हालाँकि कितना समझ पाया नही जानता..मगर जो भी है जीवन की, रिश्तों की विडम्बना है..और जीवन ऐसी विडम्बनाओं से बना है....क्या पता!!

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