शुक्रवार, 4 मई 2012

पानी!

पानी!
लहरो।
अंतरघट के बन्द कोष्ठ
सब थिर है रिक्त अतल सूखे हैं होठ।

पानी!
लहरो।
बाढ़ अगम हिय खार समुद्र सम
तनु कर तन सान्द्र साध संतुलन सम।

पानी!
लहरो।
निर्मल, मल पर कर मल मल चोट
झंझा हर क्षण हर दिन की मिटे प्रलय ओट।

पानी!
लहरो।
दाह दहन बूँदें छ्न छ्न उड़ती भाप
बरसो हों शीतल सूर्य चन्द्र और नभ संताप।

पानी!
लहरो।
जम गया भूत युग हिम स्फटिक
मुक्त करो जीवन संकुल, श्रम को आतुर नाविक।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    उद्गारों के साथ में, अंकित करना भाव।।

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  2. पानी!
    लहरो।
    कवि फूँकता सैकत कणों में आज मन-प्राण।
    वार दो तरल धमनियों में, जागृत हो नव-विहान।

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