बुधवार, 14 सितम्बर 2011

मील का पत्थर

हूँ मील का पत्थर, मेरा कोई इतिहास नहीं 
इतिहास हो जाऊँगा उस दिन, जिस दिन न बचेगा रास्ता कोई। 
मुझे निकालो, लगा दो कहीं कि राही राह भूलें 
बच रहेंगी राहें बताती चुपके से, इस जगह था निशानदाँ कोई।
आँख फाड़े चल दिये हो जब थकोगे और रुकोगे
फट रहेंगे फफोले पाँव के कहेंगे, है इस जगह अश्क दवा कोई।
चलती तुम्हारी जो चुनते न गढ़ते और न लिखते 
पत्थरों की खास तबियत घायल हुई जो, मना न सका कोई।     

5 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह वा वाह!
वही तेवर व्यंग्य वाले
वाह वा वाह!

Patali-The-Village ने कहा…

अत्यंत प्रभावशाली प्रस्तुति|

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

राह बनी रहे, मील के पत्थर पथ दिखलाते रहें।

रवि कुमार ने कहा…

बच रहेंगी राहें बताती चुपके से, इस जगह था निशानदाँ कोई।

बेहतर...

singhSDM ने कहा…

हूँ मील का पत्थर, मेरा कोई इतिहास नहीं
इतिहास हो जाऊँगा उस दिन, जिस दिन न बचेगा रास्ता कोई।
बहुत उम्दा..... सादा बयानी भी कितनी प्रभावशाली हो सकती है यह इस रचना में निहित है>>>>>