गुरुवार, 22 सितंबर 2011

इधर और उधर से भी ..

कदम पड़ेंगे लड़खड़ाते क्या पहली बार अभी? 

नज़्म टूटी नसों में, लहू सूखा, छूटे हर्फ कई
कितना सँभालूँ कैसे कि झोली तार तार हुई
बोलूँ कैसे जीभ बेहया कटखनी बदनाम हुई
हैं जबरिया होठ सिलते दर्द दुनिया सूँ सुई ~ 1~

सहेज रक्खी है जमानत पीर तरी सीने में
देह बदबू कब्र सी खाक मजा अब जीने में
रह गया इश्क गाफिल कुफ्र कामयाबी का
उसमें है रोशनी न स्याह जज्बा नादानी का ~2~

चीखता दुधिया उजाला गली में चौंका अन्धेरा
पूछो न मुझसे कि क्यों खड़ा दरो दीवार पर
न समझूँ कि टूटना उस तरफ या इस तरफ
कह लो अलविदा अब बात क्या जज्बात क्या? ~3~

  

4 टिप्‍पणियां:

  1. é0;ीखता =ठीक कीजिये तबतक समझ लूं इस नज्म को

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  2. धन्यवाद सर!
    असल में टिप्पणी का विकल्प बन्द रह गया था। देर रात जब मोबाइल से खोला तो सेव करते हुये जाने क्यों वैसा हो गया। अलसा कर सो गया कि सुबह देखेंगे और आप ने पकड़ लिया :)

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  3. चीखता दुधिया उजाला गली में चौंका अन्धेरा
    पूछो न मुझसे कि क्यों खड़ा दरो दीवार पर
    बहुत शानदार पंक्तियां हैं......!

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