शनिवार, 6 जुलाई 2013

कितना कमाते हो?

मैं जानता हूँ मित्र!
असमर्थ हूँ, व्यर्थ हूँ,
कुछ नहीं कर सकता
यह तंत्र बदलने को

लेकिन अच्छा लगता है जब
मेरी टेबल पर आश्वस्ति पाते हो

उपलब्धि लगती है कि
तुम्हारे चेहरे से सलवटें मिटती हैं
पसीना पोंछते नहीं
मुस्कुराते हुये जाते हो

मन ही मन उत्तर देता हूँ
सहस्र जिह्वा एक प्रश्न का
"कितना कमाते हो?" 

सोमवार, 3 जून 2013

तोड़ कर सारे प्रतिमान
मैंने डाल दिये हैं समय के कूड़ेदान में
जिन्हें कोई भाव न दे
उन्हें दान दे अपना अहं पोषित होता है।

छ्ल है यह लेकिन छ्लना जीवन रीति है
विकास है, बाढ़ है, परिवर्तन है
जीवन धन है छलना
मरने के बाद कौन छला जाता है?
कौन छल पाता है?
प्रतिमान तो बस जीवन के लिये हैं।

मरना निरपेक्ष है
धुकधुकी बन्द हुई
साँसों का कोटा चुका
और
हो गये सपाट लमलेट
प्रतिमान निरपेक्ष!
अहं मुक्त सम्भवा
वा या किं वा।

रविवार, 26 मई 2013

हाथ बचाया दोना है

ये जो रोना धोना है
यूँ ही पानी खोना है। 
देवों को परसादी दे 
हाथ बचाया दोना है। 
मीठी मुस्की माशूका
माँ तो बस लोना है।

कभी ऐसा कभी वैसा
इंसाँ जादू टोना है।
चन्दा चाँदी रात भर
दिन तो बस सोना है।  
फूले थे जो सूख गये
पतझड़ काँटे बोना है।

शुक्रवार, 24 मई 2013

धूमिलोत्तर : लोहे का स्वाद


लोहे का स्वाद लोहार से न पूछो जो गढ़ता है
लोहे का स्वाद घोड़े से न पूछो जो पहनता है
लोहे का स्वाद सवार से न पूछो जो चढ़ता है।
लोहे का स्वाद उस ईमानदार से पूछो जो
कार्बन प्रतिशत सीमा से बाहर होने पर भी
ठीक दर्ज करता है, बैच पास कर खुद पर कुढ़ता है
चुप्पी का तेजाब मुँह में रख गलता है
और हर शाम खुद को सांत्वना देने को गीता पढ़ता है।


('लोहे का स्वाद' सुदामा पांडेय 'धूमिल' की अंतिम कविता है। उनसे क्षमा सहित।)


शनिवार, 18 मई 2013

ऐसे भी


चिपके केश स्वेद सने ललाट पर
उठी चुम्बन चाहना अ-काम
झिझका ठिठका सकाम सोच
तुम क्या कहोगी, लोग क्या कहेंगे
उमगा क्षार नयन द्वार टपकी बूँदें
कपोलों को ऐसे भी भीगना था -
अवशता पर!