शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

गंगे! तव तीर

गंगे!
तव तीर
सूर्योदय साथ
सिमटा सारा आकाश
आजानुबाहु मैं पसार -


मैं ही ऋतु ऋत
मार्तंड मैं आदि सूक्त
परम पूत
शिव शिवा का पहला द्यूत
अर्यमा मीत
प्रथम प्रीत
जीवन शस्य
उमस
मैं विवश
दुर्धर्ष पर्जन्य
वत्सल सौजन्य  
तड़ित झंझा इन्द्रवज्रा
गैरिक प्रात संझा 
कोमल रागिनी छ्न्द
विहारिणी मधुर मन्द
सिहरन मैं शिशिर वातास
मैं बसंत का पहला प्रसाद।


गंगे!
भर नयन नीर
सब मैं
सब तू
तव तीर।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आरम्भिक तीसरी और चौथी पंक्ति पर प्रवाह थमता है आचार्यवर... तत्पश्चात एक निर्बाध सलिल प्रवाह है... हृदय को स्पर्श करती है, क्योंकि इस विस्तार के साथ ही बाल्यकाल और युवावस्था का समबन्ध रहा है!

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    1. :) धन्यवाद। दो पंक्तियाँ मुझे भी खटकी थीं। कुछ परिवर्तन किया है, अब बताइये।

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  2. जो उमस शब्द है, बीच में, उससे क्या अभिप्राय है ?

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    1. गर्भ में अपने अग्नि को लेकर
      व्यापा था जल इधर उधर
      - अग्नि और जल का संयोग >उमस, जीवन उत्पत्ति के लिये आवश्यक

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