शनिवार, 8 अगस्त 2009

बेमतलब नहीं है यह !

इन संस्कृत पंक्तियों का अर्थ बताइए।

सुविधा के लिए संधियों को तोड़ दिया गया है:

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दददो दुद्दा-दुद्-ददि

दददो दुद-दी-आद-दो:

दु-ददम् दददे दुद्दे

दद्- अदद-ददो’द-द:॥

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4 टिप्‍पणियां:

  1. अर्थ तो हमने नक़ल करके टीपा इसलिए नहीं लिखेंगे मगर है अनुप्रास अलंकार और वह भी इतना खूबसूरत और अद्वितीय कि किसी असंस्कृत (या अल्प-संस्कृत) भाषा में कहा भी नहीं जा सकता है.

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  2. पता नहीं । इतना कठिन ! नहीं, इतनी कठिन ।

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