रविवार, 2 अगस्त 2009

हरी तुम हरो जन की भीर...


"सखी मोरि नींद नसानी हो
पिय को पंथ निहारत सगरी रैना बिहानी हो।
सखियन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो।
बिन देख्यां कल नाहिं पड़त जिय, ऐसी ठानी हो।
अंग-अंग ब्याकुल भई मुख, पिय पिय बानी हो।"

करुणा की शुद्धता और अनुभूति की सान्द्रता क्या होती हैं, जानना है तो उपर्युक्त पद गाएँ या वसुन्धरा और कुमार गन्धर्व की इस पद की प्रस्तुति सुनें।

गेय परम्परा द्वारा जन जन को कृष्णमय कर देने वाली मीरा ! पुरुष प्रधान सामंती दौर में भी निष्छल, नि:स्वार्थ प्रेम का अलख जगाती मीरा ! जन की पीर से अपनी पीर को जोड़ती मीरा ! ..

मीरा के न जाने कितने रूप सामने आते हैं। लेकिन सबमें एक बहुत ही सरल भक्त नारी अत्यंत उच्च भावभूमि में घूमती जन की चिंता करती नजर आती है। यह और महत्त्वपूर्ण तब हो जाता है जब हम यह पाते हैं कि अत्यंत गर्वीले राजवंश की वह बहू थीं और सारे बन्धन तोड़ अपने नटनागर के लिए सरेआम नाची थीं।

"हरी तुम हरो जन की भीर
द्रौपदी की लाज राखी तुरत बाढ्यो चीर"

'तुरत' की जगह 'चट' शब्द भी मिलता है। दोनों समानार्थक हैं। प्रसंग है उस समय फैली महामारी का जिससे सभी त्रस्त थे। सामान्यत: लोग इसे दृष्टांत मान कर सरलार्थ कर देते हैं। बात ऐसी नहीं है।
मीरा यहाँ नटनागर को उलाहना दे रही हैं। राजरानी द्रौपदी के लिए इतनी जल्दी और आम जन के लिए सुस्ती? भक्ति और कीर्तन चाहिए तब पिघलोगे? जब कि सारे लोग लुगाई आपदा के कारण त्राण में हैं?

आगे की पंक्तियों:
"भगत कारण रूप नर हरि, धरयो आप समीर
हिरण्याकुस को मारि लीन्हो, धरयो नाहिन धीर"

में उलाहना और सघन होती है। प्रह्लाद जो कि एक राजकुमार थे, उनके लिए तो धैर्य नहीं दिखाया तुमने? नरसिंह बन गए!
मीरा आगे गजराज का सन्दर्भ दे जैसे अपने कन्हैया को याद दिलाती हैं कि सामान्य पशुओं तक पर तुमने करुणा की है। ये दु:खी जन क्या उनसे भी गए बीते हैं?

"बूड़तो गजराज राख्यो, कियौ बाहर नीर।"
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"अंतर बेदन बिरहकी कोई, पीर न जानी हो।
ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछली जिमि पानी हो।
मीरा ब्याकुल बिरहणी, सुध बुध बिसरानी हो।"

कुछ करो, तारो, दु:ख हरो नाथ। बिरहिनी ब्याकुल है ! सुध बुध खो बैठी है। मीरा की अपनी पीड़ा और जन की पीड़ा दोनों की अभिव्यक्ति में भावभूमि की कितनी समानता है!

जन पर भीर आ पड़ी है। इस रूप में भी पधारो नाथ, इस पीड़ा के दंश से मुक्ति दो।

कहते हैं प्रार्थना की सान्द्रता से कन्हैया रीझ उठे थे। महामारी का शमन हो गया। भक्त कवियों का यह जनवादी रूप ! मैं तो वारा इन पे।
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मन में सुब्बलक्ष्मी का स्वर गूँज रहा है:
"कोई कहियो रे प्रभु आवन की
आवन की मनभावन की
कहियो कहियो कहियो रे प्रभु आवन की"

मैं अब और कुछ नहीं लिख सकता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. काफ़ी अच्छी प्रस्तुति।
    ‘भक्त कवियों का यह जनवादी रूप ! मैं तो वारा इन पे।’

    आप ही के शब्दों में:
    ‘अब और कुछ नहीं लिख सकता।’

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