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बुधवार, 8 सितंबर 2010

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चलो आज सपने बुनें -
 चेताते मस्तिष्कों को
बन्द कर आलमारी में,
अनावृत्त हो दिगम्बर
चलो सपनों में रंग भरें।

मूर्खताएँ हसीन हैं
न खुश न कोई गमगीन है।
बेहिसाब नहाई तिजहर में
चलो सड़क पर खेलें -
इक्कुड़ दुक्कुड़
आइस पाइस।
चलो किसी राहगीर को
यूँ ही चिढ़ाते भाग चलें।

छ्न्द में कुछ वर्ण अधिक हैं
कुछ मात्राएँ कम हैं।
चलो यूँ करें
कविता फाड़ दें
टुकड़े गिलास में फेंट दें
फिर जमाएँ
निकाल कर एक एक अक्षर।
फिर कोई सीरियल देख लें
डायलॉग ऐसे ही तो बनते हैं!

अच्छा ऐसा करते हैं
आज के अखबार में केवल
विज्ञापन पढ़ते हैं
सभी विज्ञापन।
तुम स्टॉप वाच चालू करो
देखते हैं कौन पहले खत्म करता है?
"अबे, खत्म होने को कौन सर्टिफाई करेगा?"
"कहना ही मान लिया जाएगा।"
"ये सब क्या है?
ये बकबक क्यों कर रहे हो।"
"मुझे कुछ भुलाना है -
- घूरे पर फेंकी गई नवजात कन्या।
- बलात्कार के बाद मार दी गई
  आई सी यू में भर्ती लड़की।
- पंचायत की आँख सेंकने को
  न्याय करने को
  उघार दी गई औरत।
- खुद को बेंचने के बाद
  जाने क्या बचाने को
  ऊँचे फ्लैट से कूद गई युवती।
- ईश निन्दा के आरोप में
  हाथ कटाने वाला इंसान ..."
"भोले हो!
भुलाने से क्या होगा?"

"कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। 
लेकिन 
सपने बचेंगे
रंग भरेंगे
खेलेंगे
चिढ़ाएँगे 
 सीरियल देखेंगे ... 

मैं बच तो जाऊँगा।
क्या यह कम है?"
"तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है।"

चलो! सिगरेट पी आते हैं।
बेहतर है यह काम
कहीं माचिस लगाने से।

"तुम पागल हो।"