रविवार, 30 अक्तूबर 2016

अकेली जरा का पर्व

नीम झरे दुअरा पर सूखी, चौकी पर है धूर।
शमी गाछ की छाँह कँटीली, स्वामी घर से दूर॥
सोने के पिजड़े में सुगना, ना दाना ना ठोर।
रामनाम की टेर लगी है, जाना है उस छोर॥
गइया सब को कौरा पहुँचे, चिरई सब को नीर।
मनपूओं की बात अधूरी, ज्यों स्मृतियों की खीर॥
सूगर फ्री में बनी तस्मई, देवकुर पाकड़ घाट।
गदबेरा अबीर में सुत की, मइया जोहे बाट॥
सन्नाटा है घर के आँगन, सिमटा सकल वितान।
भीगी आँखों बुढ़िया देखे, बासी सब पकवान॥

1 टिप्पणी:

  1. इस कविता की व्यथा और व्यक्त-अव्यक्त समस्त भावों को ह्रदय से अनुभव कर पाता हूँ. किन्तु सृष्टि के इस नियम के समक्ष कौन ठहर पाया है. आपकी इन संवेदनाओं में मुझे भी सम्मिलित पाएं! मेरा नमन है उनको!

    उत्तर देंहटाएं