सोमवार, 21 जुलाई 2014

गधे पर रकाब

हम जिसे ख्वाब कहते हैं
वो उसे खराब कहते हैं

छुपा है रूप नूर के पीछे
आँखों से हिजाब दिखते हैं

इश्क़ उनकी लिखाई में 
हर्फ हर्फ शबाब दिखते हैं

कीमती बहुत मायूसियाँ
नफरतें बेहिसाब रखते हैं

तैयारी है अश्वमेध की
गधे पर रकाब कसते हैं

~ गिरिजेश राव 

3 टिप्‍पणियां:

  1. इसे ग़ज़ल मानूँ!! जो भी हो, मज़ा आया!! आपकी रचना है तो अनोखी होगी ही!!

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  2. सुबहान अल्लाह!
    इस सादगीपे कौन न मर जाये ऐ खुदा
    लड़ने चले हैं, जेब में घुड़साल भी नहीं

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  3. तैयारी है अश्वमेध की
    गधे पर रकाब कसते हैं।
    :-D

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