शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

सी!

छन छपी है धूप बगीची बीच सुबह सुबह
निफूले हरसिंगार तले तुम्हारी हँसी सी!
टँगी ओस अदद एक शमी की झुकी पत्ती पर 
सद्य:स्नात केश बूँद अकेली नयनाँ बसी सी!
उजली जमीं फेंक गया कोई लाल फूल कनैल तले
टोने टोटके वारी सब गोरे हाथ मेंहदी कसी सी

3 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दचित्र से श्रृंगार जहर रहा है! किन्तु कुछ खटक भी रहा है... क्या और क्यों... व्यक्त करने में असमर्थ पा रहा हूँ स्वयं को!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बनारस की बिजली, चश्मिस, अबीर-सेनूर, ताम्र-स्वर्ण, चाय के साथ पारले जी, तुलसी बिरवे बीच सरसो... कुल 17 पोस्ट पढ़ा आज इस ब्लॉग पर।
    आलसी पर 36 बैकलॉग है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. धूप बगीची बीच सुबह सुबह.......वाह ! बहुत गरिष्ठ सौन्दर्य.....जबरदस्त ! आप खुद भी ऐसा कम ही लिख पाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं