मंगलवार, 11 नवंबर 2014

चाय ठंडी हुई!

गुनगुनी प्रात
कुनकुनी धूप
उनके होठों पर
पाटल दल स्पर्श
देह ओस ठिठकी
उड़ी भाप
चाय ठंडी हुई!

3 टिप्‍पणियां:

  1. कविता पढ़कर
    बुद्धि ठिठकी
    उड़ी हवाई
    जिज्ञासा ठंडी हुई

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  2. किसी विज्ञापन जगत के महर्षि के लिये इससे बेहतर कोई कॉपीराइटिंग हो ही नहीं सकती! मैं तो आपकी इस कविता को पढते हुये सम्पूर्ण दृश्य को अपनी बन्द आँखों से देख पा रहा हूँ!
    सिम्प्ली कमाल!!

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