शनिवार, 23 जनवरी 2010

पुरानी डायरी से -12 : श्रद्धा के लिए

13 दिसम्बर 1993, समय:__________                                 श्रद्धा के लिए


तुम्हारा बदन 
स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा  
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।


दु:ख यही है 
मेरे दृष्टिपथ में 
अभी तक तुम नहीं आई।
कहीं  ऐसा तो नहीं 
कि तुम हो ही नहीं !
नहीं . . . . 

पर मेरी कल्पना तो है - 
"तुम्हारा बदन 
स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।"


शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

री !

सुरसरि तट
सर सर लहर सुघर सुन्दर लहर कल कल टल मल सँवर चल कलरव रव री !
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हिन्दी कविता के प्रयोगवादी दौर में एक वर्ग ऐसा भी रहा जो छ्पे हुए शब्दों को भी एक तार्किक समूह में कागज पर रख देने का हिमायती था ताकि कविता की लय (अर्थ और विचार दोनों) छपाई तक में दिखे। उतना तो नहीं लेकिन सुधी जन की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यति की दृष्टि से पंक्तियों में तोड़ दें तो कविता यूँ दिखेगी:
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सुरसरि तट

सर सर लहर सुघर सुन्दर
लहर कल कल टल मल
सँवर चल
कलरव
रव री !



सोमवार, 18 जनवरी 2010

देह गन्ध ... सिद्धि हुई जीवन की।

स्मरण दिवस प्रिये, निमंत्रण देह गन्ध
पहली बेला महकी।


वलय वृत्त गणित, सौन्दर्य सृष्टि अपार 
केवल सन्तति हेतु ?

तुमने रचा संसार, मधु राग राग स्वर 
आभा नृत्य अभिसार ।

अधर मार्दव चूम, दाड़िम दंत पखार 
स्पर्श सुख सहसा सा।

रोम रोम रस धार, छाया विद्युत प्रवाह 
कसा बसा आलिंगन।

टूटे बन्ध देह मुक्त, तड़प उठी बिजली 
लयकारी सिसकी की।

साँसे ऊष्ण संघर्षण, दो एकाकी हुए एक 
आहुति अर्घ्य संगति।

प्लवित मन सकार, नेह झील पूरन सी 
सिद्धि हुई जीवन की।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

संक्रांति संग जाएगा बचपना

घर में आइस पाइस*
ठिठुरन संग।
छुपा हूँ रजाई में।

ठिठुरन देखती
पकड़ नहीं पा रहीIMG213-01
कह नहीं पा रही
- वो: देखो !

रोज होता ऐसा 
पर आज ठिठुरन
आई संक्रांति सहेली संग।
संक्रांति बेशरम
खींचती है रजाई

नहाने को कहती है।
संक्रांति आई है
बस एक दिन के लिए
ठिठुरन सहेली संग जाएगी
अनजान देश।

मैं भी खुश
चलो ठिठुरन संग
जाएगा बचपना भी
रजाई में दुबक छिपना।

कितना अजीब !
सहेली के जाने पर भी
यूँ खुश होना।

आज मित्र बसंत की पाती आई है।
आने का वादा किया है।
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* आइस पाइस - लुका छिपी का खेल।

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

युगनद्ध - 2

युगनद्ध - 1



सज गई
फिर 
उड़ी आवर्तों में 
सिहरी, लहकी
खुली बहकी
लहर लहर
नाच उठी।

सहलाया
दुलराया
सीने से लगा
बहकाया
दे सहारा घुमाया
आनन्द आवर्तों में।


गूँज उठी किलकारी 
बच्चों की।
युगनद्ध जो हुए थे
पतंग और पवन।