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मंगलवार, 12 जनवरी 2010

युगनद्ध - 2

युगनद्ध - 1



सज गई
फिर 
उड़ी आवर्तों में 
सिहरी, लहकी
खुली बहकी
लहर लहर
नाच उठी।

सहलाया
दुलराया
सीने से लगा
बहकाया
दे सहारा घुमाया
आनन्द आवर्तों में।


गूँज उठी किलकारी 
बच्चों की।
युगनद्ध जो हुए थे
पतंग और पवन।